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रामकथा के पात्रों का चरित्र चित्रण


Sneh Jain

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अब हम रामकथा को रामकथा के पात्रों के चरित्र चित्रण के माध्यम से समझने का प्रयास करेंगे। पात्रों के चरित्र-चित्रण से राम काव्य की कथावस्तु तो स्पष्ट होगी ही, साथ ही मानव मन के विभिन्न आयाम भी प्रकट होंगे। इस संसार में रंक से लेकर राजा तक कोई भी मनुष्य पूर्णरूप से सुखी एवं षान्त नहीं है। प्रत्येक मनुष्य के विकास मार्ग को उसकी किसी न किसी मुख्य मानवीय कमजोरी ने अवरुद्ध कर रखा है। अज्ञानवष व्यक्ति अपनी कमजोरियों का अन्वेषण नहीं कर पाने के कारण उचित समय पर उनका परिमार्जन नहीं कर पाता,, जिससे वह अपने वर्तमान जीवन में संक्लेषपूर्वक मरण को प्राप्त कर आगे भी दुर्गति को प्राप्त होता है। स्वयंभू पर अपभ्रंष भाषा के प्रथम अध्यात्मग्रंथकार आचार्य योगिन्दु (छठी षती ई.)  का पूर्ण प्रभाव है। पउमचरिउ का सम्पूर्ण अध्ययन कर चुकने के बाद प्रतीत होता है कि योगिन्दु और स्वयंभू संवेदना के स्तर पर एक कोटि के हैं। दोनों का ही समभाव की भूमि पर खड़ा होने से समान रूप से सन्तुलित व्यक्तित्व है। अपने इस ही व्यक्तित्व के कारण स्वयंभू ने जिस तरह से रामकाव्य के चरित्रों की अवतारणा की है, वह आज के युग में बहुत उपयोगी है। विभिन्न पात्रों के चरित्र से व्यक्ति तादात्म्य स्थापित कर अपने मन की कमजोर प्रवृत्तियों का अन्वेषण करना प्रारम्भ करता है। इसके बाद पष्चाताप कर उनका परिमार्जन कर इस जन्म में षान्तिपूर्वक मरण को प्राप्त कर आगे भी सुगति को प्राप्त हाता है।  

 

 

जैन दर्षन में मानव की आधारभूत कमजोरी ‘राग’ के रूप में देखी गयी है। आगे चलकर यह राग की जड़ ही अनेक बुराइयों की षाखा के रूप में पल्लवित होती देखी गयी है। वैसे भी सभी महापुरुषों ने अपने ध्यान की अनुभूति को राग नही करने में ही अभिव्यक्त किया है। पउमचरिउ में अन्त में ध्यान पूरा होने के बाद सर्वप्रथम राम इन्द्रपर्याय प्राप्त सीता के पूर्वभव जीव को राग छोड़ने का उपदेष देते देखे गये हैं। श्री कृष्ण भी गीता में ‘कर्म करो किन्तु फल की आषा मत करो’ कहकर इस राग को छोड़ने का ही संदेष देते हैं। अध्यात्म का कोई भी ग्रंथ राग के कथन से अछूता नहीं है। तो हम देखते हैं इक्ष्वाकुवंष व रामकथा के पात्रों के माध्यम से मानव मन के विभिन्न आयामों को एवं उनसे प्राप्त फलों को।


1. ऋषभदेव

ऋषभदेव से ही इक्ष्वाकुवंष तथा विद्याधरवंष की स्थापना हुई है। इनके समय में कल्पवृक्षों के नष्ट हो जाने के कारण जीवन जीने की समस्या उत्पन्न हुई। ऋषभदेव ने ही असि, मसि, कृषि, वाणिज्य और अन्य दूसरी विद्याओं की षिक्षा देकर प्रजा को जीवन जीने का उपाय बताया। नन्दा व सुनन्दा से ऋषभदेव का विवाह हुआ तथा इनके भरत व बाहुबलि के समान सौ पुत्र हुए। सभी पुत्रों को षासन करने हेतु अलग-अलग नगर प्रदान कर तथा भरत को राज्य लक्ष्मी देकर ऋषभदेव संन्यास ग्रहण कर तप में लीन हो गये। तप करते हुए इनको केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। कैलाष पर्वत पर प्रतिष्ठित होकर निर्वाण को प्राप्त हुए। इनके गर्भ, जन्म, तप, ज्ञान एवं निर्वाण से सम्बन्धित सभी कल्याणक महोत्सव देवों के द्वारा मनाये गये।


2. भरत
भरत इक्ष्वाकुवंषी ऋषभदेव के पुत्र हैं। ऋषभदेव के संन्यास ग्रहण करने पर ये राज्यलक्ष्मी के अधिकारी बने। अनेक राजाओं को अपने अधीनस्थ बनाकर भरत जैसे ही अयोध्या में प्रवेष करते हैं, उनका चक्ररत्न अयोध्या नगर में प्रवेष नहीं कर सका। भरत ने मन्त्रियों से इसका कारण अपने छोटे भाई पोदनपुर के राजा बाहुबलि का अधीन नहीं होना जाना। उन्होंने बाहुबली के पास अपनी आज्ञा मनवाने हेतु दूत भेजा। बाहुबलि ने भरत के प्रस्ताव को ठुकरा दिया। तब क्रोधित हुए भरत ने युद्ध के लिए कूच कर दिया। मंत्रियों के परामर्ष से हिंसक युद्ध को विराम दिया जाकर दोनों के मध्य दृष्टि, जल एवं मल्ल युद्ध प्रारम्भ हुआ। तीनों ही युद्ध में विजय के उत्कट आकांक्षी भरत बाहुबलि से पराजित हुए। विजयी बाहुबलि ने संन्यास ग्रहण कर लिया। लम्बे समय तक भी बाहुबलि को केवलज्ञान की प्राप्ति नहीं होने पर भरत ने पिता ऋषभदेव से इसका कारण पूछा। तब ऋषभदेव ने बाहुबलि के मन में भरत की भूमि पर खडे़ होने का कषाय भाव होना बताया। यह जानकर भरत प्रेम व उपकार की भावना से भरकर षीघ्र बाहुबलि के पास गये। बाहुबलि के चरणों में गिरकर भरत ने कहा-  यह धरती आपकी ही है। इस प्रकार उनके कषाय भाव को षान्त करने में सहयोग प्रदान कर उनके केवलज्ञान प्राप्ति में सहायक बने। अन्त में भरत ने अयोध्या में अर्ककीर्ति को प्रतिष्ठित कर वैराग्य धारण कर लिया। इस प्रकार चक्रवर्ती भरत का जीवन राग व वैराग्य दोनों से युक्त देखा जाता है।

 

3. बाहुबलि

बाहुबलि इक्ष्वाकुवंषी ऋषभदेव के पुत्र एवं राजा भरत के छोटे भाई हैं। पिता ऋषभदेव द्वारा दिये गये पोदनपुर नगर को प्राप्त कर बाहुबलि पोदनपुर के राजा बने। इनका षान्त, स्वतन्त्रता प्रिय, पराक्रमी एवं निर्भीक व्यक्तित्व है।इनको स्वचेतना की किंचित भी परतन्त्रता मान्य नहीं है। दूत से भरत की अधीनता स्वीकार करने की बात सुन निर्भीक बाहुबली स्पष्ट रूप से कहते हैं - ‘‘प्रवास करते हुए परमजिनेष्वर ने जो कुछ भी विभाजन करके दिया है वही हमारा सुखनिधान षासन है। मैंने किसी के साथ कुछ भी बुरा नहीं किया। मैं अपनी ताकत से ही जीता हूँ भरत की ताकत से नहीं। एक चक्र से ही यह घमण्ड करता है कि मैंने समूची धरती अधीन करली है। मैं कल उसे ऐसा कर दूंगा जिससे उसका सारा दर्प चूर-चूर हो जायेगा’’। पराक्रमी बाहुबली भरत के साथ हुए दृष्टि, जल एवं मल्ल तीनों युद्धों में विजयी हुए।

भरत के द्वारा चक्र छोड़ा जाने पर बाहुबलि सोचते हैं कि मैं उसको आज धरती पर गिरा दूँ।  पुनः षान्त प्रकृति बाहुबलि ने यह विचार किया कि राज्य के लिए अनुचित किया जाता है। भाई, बाप और पुत्र को मार दिया जाता है। तब अपने आपको धिक्कार कर एवं दीक्षा ग्रहण कर मोक्षमार्ग की साधना में लीन हो गये। थोडे़ ही दिनों में वे घातिया कर्म का नाष कर सिद्ध हो गये।

सच्चे अर्थ में यदि संसार से अन्याय को हटाना हो तथा स्वयं के व्यक्तित्व को विकसित करना हो तो बाहुबलि का चरित्र अनुकरणीय है। पिता ऋषभदेव से भी पहले बाहुबलि मोक्ष गये।

इस ही कडी में आगे राम के पिता दषरथ के चरित्र चित्रण से कथन पुनः प्रारम्भ किया जायेगा। रामकथा का आरम्भ यही से होगा। 

 

 


 


 


 


 

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