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धर्म संकट - अमृत माँ जिनवाणी से - ३१२

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Abhishek Jain

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जय जिनेन्द्र बंधुओं,

 
         पूज्य शान्तिसागरजी महराज के जीवन के इस प्रसंग को जानकर आपको बहुत सारी बातें देखने को मिलेगीं। साम्य मूर्ति पूज्य शान्तिसागरजी महराज के सम्मुख बड़ी बड़ी विपत्तियाँ यूँ ही टल जाती थीं, यह उनकी महान आत्मसाधना का ही प्रतिफल था। वर्तमान में पूज्य आचार्य विद्यासागरजी महराज तथा अन्य और भी मुनिराजों के जीवन का अवलोकन करने से अनायास ही ज्ञात हो जायेगा।

               दिगम्बर मुनिराज की अद्भुत क्षमा का इससे बड़ा उदाहरण क्या होगा कि नंगी तलवारों से उन पर प्रहार करने आए गुंडों के समूह के लोगों को भी उनके अपराध के फलस्वरूप कैद से छुड़वाने के लिए वह यह कहकर आहार को न निकले कि "मेरे कारण यह जेल में दुख भोग रहा है तो ऐसे मैं कैसे आहार को निकल सकता हूँ। ऐसे प्रसंगों को हमको स्वयं जानना चाहिए और अन्य सभी लोगों को भी दिगम्बर मुनिराजों की अनंत क्षमा से परिचित कराना चाहिए।

?   अमृत माँ जिनवाणी से - ३१२   ?


                     "धर्म संकट"


               अब पाँचवा दिन आया, किसे कल्पना थी कि आज कल्पनातीत उपद्रव होगा, किन्तु सुयोग की बात कि उस दिन आचार्य महराज चर्या के हेतु कुछ पूर्व निकल गए थे। आहार की विधि भी शीघ्र सम्पन्न हो गई।

             सब त्यागी लोग चबूतरे पर सामायिक करने का विचार कर रहे थे, आचार्यश्री ने आकाश पर दृष्टि डाली और उन्हें कुछ मेघ दिखाई दिए। यथार्थ में वे जल के मेघ नहीं, विपत्ति की घटा के सूचक बादल थे। उनको देखकर आचार्यश्री ने कहा कि 'आज सामायिक भीतर बैठकर करो'।

              गुरुदेव के आदेश का सबने पालन किया। सब मुनिराज आत्मा के ध्यान में मग्न हो गए। सर्व जीवों के प्रति हमारे मन में समता का भाव है, यह उन्होंने अपने मन में पूर्णतः चिंतवन किया और तत्व चिंतन भी प्रारम्भ किया। अन्य श्रावक लोग अतिथि संविभाग कार्य के पश्चात अपने-२ भोजन में लगे।

              इतने में क्या देखते हैं, लगभग ५०० गुंडे नंगी चमचमाती तलवार लेकर मुनि संघ पर प्रहार करने के हेतु छिद्दी ब्राम्हण के साथ वहाँ आ गए।

            मुनिराज आज बाहर ध्यान नहीं कर रहे थे, इससे उनकी आक्रमण करने की पाप भावना मन के मन में ही रही आयी। उन नीचों ने जैन श्रावकों पर आक्रमण किया। श्रावकों ने यथायोग्य साधनों से मुकाबला किया। श्रावकों ने जोर की मार लगाकर उन आतताइयों को दूर भगाया था, किन्तु शस्त्र सज्जित होने के कारण वे पुनः बढ़ते आते थे, ताकि जैन साधुओं के प्राणों के साथ होली खेलें। श्रावक भी गुरुभक्त थे। प्राणों की परवाह न करते हुए उनसे खूब लड़े। किसी का हाथ कटा किसी की अंगुली कटी, जगह-२ चोट आई।

         इतने में संध्या को रियासत की सेना आयी, तब इन नर पिशाचों का उपद्रव रुका। छिद्दी नामक ब्राम्हण पकड़ लिया गया। उस उपद्रव के समय संघ के साधुओं में भय का लेश भी नहीं था, वे ऐसे बैठे थे, मानों कोई चिंता की बात ही न होवे। उन्होंने अद्भुत आत्म संयम का परिचय दिया। उस समय मेघो ने भयंकर वर्षा कर दी थी, इससे उपद्रवकारियों का मनोबल सफल न हो पाया। प्रकृति ने धर्म रक्षा में योग दया था।

            पुलिस के बड़े-२ अधिकारी मुनि महाराजों के पास आये। उनके दर्शन कर उनके मन में उपद्रव कारियों के प्रति भयंकर क्रोध जागृत हुआ। वे सोचने लगे, ऐसे महात्मा पर जुल्म करने की उन नरपिशाचों ने चेष्टा कर बड़ा पाप किया। उनको कड़ी से कड़ी सजा देंगे।

   ?साम्य भाव अर्थात विश्व बंधुत्व?

                  प्रभात का समय आया। आचार्य महराज ने यह प्रतिज्ञा की थी, कि जब तक तुम छिद्दी ब्राम्हण को हिरासत से नहीं छोड़ोगे, तब तक हम आहार नहीं लेंगे।

             आचार्य महराज के व्यवहार को देखकर कौन कहेगा कि इनकी दृष्टि में भी कोई शत्रु नाम की प्राणधारी मूर्ति है? अपने अनन्त प्रेम से ये समस्त विश्व को मंगलमय बनाते हैं।

? स्वाध्याय चारित्र चक्रवर्ती ग्रंथ का ?
?आज की तिथी - चैत्र शुक्ल अष्टमी?

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