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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         कल हमने देखा की पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी का जन्म सवत १९३१ अर्थात सन् १८७४ में हसेरा नामक ग्राम में हुआ था।          वर्णीजी द्वारा वर्णित उनकी बाल्यावस्था के समय उस क्षेत्र में लोगों के आचार-विचार तथा जीवन शैली का वर्णन निश्चित ही हम पाठकों के ह्रदय को छूने वाली है। कितना सरल व सहज तथा आनन्दप्रद जीवन था उस समय के लोगों का।       कल की प्रस्तुत सामग्री से एक महत्वपूर्ण बात हम सभी को जानने को मिली, उस समय लोग आपने हाथों से ही अपने खेतों में उगने वाले कपास से निर्मित वस्त्र पहनते थे। अतः उस समय त्वचा समबन्धी रोग नहीं हुआ करते थे।         जो पाठक इस जीवनी को रूची पूर्वक पढ़ रहे होंगे निश्चित ही उनका मन गौरवशाली अतीत के स्पर्श से आनंदित हुए बिना नहीं रह पाया होगा।     कल आप पढ़ेंगे अजैन कुल में जन्में बालक गणेश प्रसाद में जैतत्व के संस्कारों का आरोपण।         ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
 *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                      क्रमांक - ३       
             उस समय मनुष्य के शरीर सुदृढ़ और बलिष्ठ होते थे। वे अत्यंत सरल प्रकृति के होते थे। अनाचार नहीं के बराबर था।         घर-२ गायें रहती थी। दूध और दही की नदियाँ बहती थी। देहात में दूध और दही की बिक्री नहीं होती थी।         तीर्थयात्रा सब पैदल करते थे। लोग प्रसन्नचित्त दिखाई देते थे। वर्षाकाल में लोग प्रायः घर ही रहते थे। वे इतने दिनों का सामान अपने घर में ही रख लेते थे। व्यापारी लोग बैल को लादना बंद कर देते थे। वह समय ही ऐसा था, जो इस समय सबको आश्चर्य में डाल देता है।         बचपन में मुझे असाता के उदय से सुकीका रोग हो गया था। साथ ही लीवर आदि भी बढ गया था। फिर भी आयुष्कर्म के निषेको की प्रबलता के कारण इस संकट से मेरी रक्षा हो गयी थी।            मेरी आयु जब ६ वर्ष की हुई, तब मेरे पिता मड़ाबरा आ गए थे। तब यहाँ मिडिल स्कूल था, डाक-खाना था और पुलिस थाना भी था। नगर अतिरमणीक था। वहाँ पर दस जिनालय और दिगम्बर जैनियों के १५० घर थे। प्रायः सब सम्पन्न थे।
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
  ? आजकी तिथी- वैशाख कृष्ण ६?

Abhishek Jain

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - २

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
 *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                प्रस्तुती क्रमांक -२     
             मेरा नाम गणेश वर्णी है। जन्म संवत् १९३१, कुवाँर वदि ४ को हसेरा ग्राम में हुआ था। यह जिला ललितपुर (झाँसी), तहसील महरोनी के अंतर्गत मदनपुर थाने में स्थित है।       पिता का नाम श्री हीरालालजी माता का नाम उजियारी था। मेरी जाति असाटी थी। यह प्रायः बुंदेलखंड में पाई जाती है। इस जाति वाले वैष्णव धर्मानुयायी होते हैं।      मेरे पिताजी की स्थिति सामान्य थी। वे साधारण दुकानदारी के द्वारा अपने कुटुम्ब का पालन करते थे। यह समय ही ऐसा था, जो आज की अपेक्षा बहुत ही अल्प द्रव्य में कुटुम्ब का भरण पोषण हो जाता था।      उस समय एक रुपये में एक मनसे अधिक गेहूँ, तीन सेर घी, और आठ सेर तिल का तेल मिलता था। शेष वस्तुएँ इसी अनुपात में मिलती थीं।        सब लोग कपढ़ा प्रायः घर के सूत के पहनते थे। सबके घर चरखा चलता था। खाने के लिए घी, दूध भरपूर मिलता था। जैसा कि आज कल देखा जाता है उस समय क्षय-रोगियों का सर्वथा अभाव था।
?एक आत्मकथा - मेरी जीवन गाथा?
? *आजकी तिथी- वैशाख कृष्ण ५*?

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☀अपनी बात -१

☀☀
जय जिनेन्द्र बंधुओं,       आज से जैन संस्कृति के महान संवर्धक पूज्य गणेश प्रसादजी वर्णी की जीवनी को उनकी ही आत्मकथा के अनुसार प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।         पूज्य गणेश प्रसाद जी एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने अजैन कुल में जन्म होने के बाद भी, अत्यंत संघर्ष पूर्ण जीवन के साथ ऐसे समय में जैन संस्कृति का संवर्धन किया जब देश जैन धर्म को जानने वाले विद्धवान बहुत ही कम थे। वर्तमान में इतनी आसानी बड़े-२ ग्रंथों का अध्यापन हेतु विद्धवान उपलब्ध है यह वर्णी जी का उपकार कहा जा सकता है।         वर्णी जी का जीवनी हम सभी के लिए अत्यंत ही प्रेरणास्पद है। यह पढ़कर निश्चित ही सभी को अत्यंत हर्ष भी होगा।         यह समस्त सामग्री मैं पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी द्वारा लिखित उनकी आत्मकथा *मेरी जीवन गाथा* ग्रंथ से प्रस्तुत कर रहा हूँ। सामग्री की महत्वता के स्पष्टीकरण हेतु प्रारम्भ में कही कही मेरे अपने शब्द होंगे जो यथार्थ के समानार्थी ही होंगे।         वर्णी जी की जीवनी हर श्रावक को पढ़ना क्यों आवश्यक इस बात के स्पष्टीकरण के लिए बहुत बड़े विद्धवान स्वर्गीय पंडित पन्नालाल जी द्वारा ग्रंथ में लिखी अपनी बात को सर्वप्रथम प्रस्तुत कर रहा हूँ।   ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                 *"अपनी बात"*
                 प्रस्तुती क्रमांक -१
            पाठकगण स्वयं पढ़कर देखेंगे कि "मेरी जीवन गाथा" पुस्तक कितनी कल्याण प्रद है। ये भी अनायास समझ सकेंगे कि एक साधारण पुरुष कितनी विपदाओं की आँच सहकर खरा सोना बन जाता है।        इस पुस्तक को पढ़कर कहीं पाठकों के नेत्र आंसुओं से भर जावेंगे तो कहीं ह्रदय आनंद में उछलने लगेगा और कहीं वस्तु स्वरूप की तात्विक व्याख्या समझ करके शांतिसुधा का रसास्वादन करने लगेंगे।        इसमें सिर्फ जीवन घटनाएँ नहीं हैं किन्तु अनेक तात्विक उपदेश भी हैं जिससे यह एक धर्मशास्त्र का ग्रंथ बन गया है।        पूज्यश्री ने अपने जीवन से सम्बद्ध अनेकों व्यक्तियों का इसमें परिचय दिया है, जिससे यह आगे चलकर इतिहास का भी काम देगा, ऐसा मेरा विश्वास है।     अंत में मेरी यही भावना है कि इसका ऐसे विशाल पैमाने पर प्रचार हो जिससे सभी इससे लाभान्वित हो सकें।                                 तुच्छ 
                           पन्नालाल जैन ?एक आत्मकथा - मेरी जीवन गाथा?
? *आजकी तिथी - वैशाख कृष्ण ४*?

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३९

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी श्री वीरप्रभु के चरणों में जो चिंतन कर रहे थे वह अंश यहाँ प्रस्तुत है। बहुत ही सुंदर तत्वपरक चिंतन है।        निरंतर स्वाध्याय की रुचि रखने वाले पाठक पूज्य वर्णीजी के तत्वचिंतन से आनंदानुभूति कर रहे होंगे। अन्य पाठक भी श्रद्धा पूर्वक अवश्य पढ़ें क्योंकि जिनेन्द्र भगवान प्रणीत तत्वों की अभिव्यक्ति संसार के सर्वोत्कृष्ट आनंद का अनुभव कराने वाली होती है।      अगली प्रस्तुती में भी इसी के शेष अंश का वर्णन रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                      *क्रमांक - ३९*        मोहकर्म के उदय में यह जीव नाना प्रकार की कल्पनाएँ वर्तमान पर्याय की अपेक्षा तो सत है परंतु कर्मोदय के बिना उनका अस्तित्व नहीं, अतः असत हैं।         पुदगल द्रव्य की अचिन्त्य शक्ति है। यही कारण है कि वह अनंत ज्ञानादि गुणों को प्रगट नहीं होने देता और इसी से कार्तिकेय स्वामी ने स्वामि कर्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखा है कि- "कापि अपुव्वा दिस्सइपुग्गलदव्यस्स एरिसी सत्ती।केवलणाणसहावो,विणासिदौ जाइ जीवस्य।।        'अर्थात पुदगल द्रव्य में कोई अपूर्व शक्ति है जिससे की जीव का स्वभाव भूत केवलज्ञान भी तिरोहित हो रहा है।' यह बात असत्य नहीं। जब आत्मा मदिरापान करता है तब उसके ज्ञानादि गुण विकृत होते प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। मदिरा पुदगल द्रव्य ही तो है। अस्तु,                यद्यपि जो आपके गुणों का अनुरागी है वह पुण्यबंध नहीं चाहता, क्योंकि पुन्यबंध संसार का ही कारण है, अतः ज्ञानी जीव, संसार का कारण जो भाव है उसे उपादेय नहीं मानता। चारित्र मोह के उदय में ज्ञानी जीव के रागादिक भाव होते हैं, परंतु उनमें क्रतत्वबुद्धि नहीं । तथाहि- 'कर्तत्वं न स्वभावोस्य चितो वेदयितृत्ववत।अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः।।'         'जिस प्रकार कि भोक्तापन आत्मा का स्वभाव नहीं है। अज्ञान से ही यह आत्मा कर्ता बनता है। अतः अज्ञान के अभाव में अकर्ता ही है।'         ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१३?

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३८

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                      *क्रमांक - ३८*        मोहकर्म के उदय में यह जीव नाना प्रकार की कल्पनाएँ वर्तमान पर्याय की अपेक्षा तो सत है परंतु कर्मोदय के बिना उनका अस्तित्व नहीं, अतः असत हैं।         पुदगल द्रव्य की अचिन्त्य शक्ति है। यही कारण है कि वह अनंत ज्ञानादि गुणों को प्रगट नहीं होने देता और इसी से कार्तिकेय स्वामी ने स्वामि कर्तिकेयानुप्रेक्षा में लिखा है कि- "कापि अपुव्वा दिस्सइपुग्गलदव्यस्स एरिसी सत्ती।केवलणाणसहावो,विणासिदौ जाइ जीवस्य।।        'अर्थात पुदगल द्रव्य में कोई अपूर्व शक्ति है जिससे की जीव का स्वभाव भूत केवलज्ञान भी तिरोहित हो रहा है।' यह बात असत्य नहीं। जब आत्मा मदिरापान करता है तब उसके ज्ञानादि गुण विकृत होते प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। मदिरा पुदगल द्रव्य ही तो है। अस्तु,                यद्यपि जो आपके गुणों का अनुरागी है वह पुण्यबंध नहीं चाहता, क्योंकि पुन्यबंध संसार का ही कारण है, अतः ज्ञानी जीव, संसार का कारण जो भाव है उसे उपादेय नहीं मानता। चारित्र मोह के उदय में ज्ञानी जीव के रागादिक भाव होते हैं, परंतु उनमें क्रतत्वबुद्धि नहीं । तथाहि- 'कर्तत्वं न स्वभावोस्य चितो वेदयितृत्ववत।अज्ञानादेव कर्तायं तदभावादकारकः।।'         'जिस प्रकार कि भोक्तापन आत्मा का स्वभाव नहीं है। अज्ञान से ही यह आत्मा कर्ता बनता है। अतः अज्ञान के अभाव में अकर्ता ही है।'         ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१२?

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३७

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                      *क्रमांक - ३७*                श्री भगवान उपेक्षक हैं, क्योंकि उनके राग द्वेष नहीं है। जब यह बात है तब विचारो, जिनके राग द्वेष नहीं उनकी अपने भक्त की भलाई करने की बुद्धि नहीं हो सकती। वह देवेन्द्र ही क्या?        फिर प्रश्न हो सकता है कि उनकी भक्ति करने से क्या लाभ ? उनका उत्तर यह है कि जो मनुष्य छायादार वृक्ष के नीचे गया, उसको इस की आवश्यकता नहीं कि वृक्ष से याचना करे-हमें छाया दीजिए।        वह तो स्वयं ही वृक्ष के नीचे बैठने से छाया का लाभ ले रहा है। एवं जो रुचि पूर्वक भी अरिहंत देव के गुणों का स्मरण करता है उसके मंद कषाय होने से स्वयं शुभोपयोग होता है और उसके प्रभाव से स्वयं शांति का लाभ होने लगता है।        ऐसा निमित्त नैमत्तिक संबंध बन रहा है। परंतु व्यवहार ऐसा होता है जो वृक्ष की छाया। वास्तव में छाया तो वृक्ष की नहीं, सूर्य की किरणों का वृक्ष के द्वारा रोध होने से वृक्ष तल में स्वयमेव छाया हो जाती है। एवं श्री भगवान के गुणों का रुचि पूर्वक स्मरण करने से स्वयमेव जीवों के शुभ परिणामों की उत्पत्ति होती है, फिर भी व्यवहार में ऐसा कथन होता है कि भगवान ने शुभ परिणाम कर दिए।       भगवान को पतित पावन कहते हैं अर्थात जो पापियों का उद्धार करे वह पतित पावन है। यह कथन भी निमित्त कारण की अपेक्षा है। निमित्तकारणों में भी उदासीन निमित्त हैं प्रेरक नहीं, जैसे मछली गमन करे तो जल सहकारी कारण होता है। एवं जो जीव पतित है वह यदि शुभ परिणाम करे तो भगवान निमित्त हैं। यदि वह शुभ परिणाम न करे तो वह निमित्त नहीं।       वस्तु की मार्यादा यही है परंतु से कथन शैली नाना प्रकार की है। 'यथा कुल दीपकोयं बालकः, 'माणवकः सिंहः'। विशेष कहाँ तक लिखें? आत्मा की अचिन्त्य शक्ति है। वह मोहकर्म के निमित्त से विकास को प्राप्त नहीं होती।        मोहकर्म के उदय में यह जीव नाना प्रकार की कल्पनाएँ वर्तमान पर्याय की अपेक्षा तो सत है परंतु कर्मोदय के बिना उनका अस्तित्व नहीं, अतः असत हैं।         ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१२

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☀उपवास तथा महराज के विचार - ३३६

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३६  ?
       *उपवास तथा महराज के विचार*
          सन १९५८ के व्रतों में १०८ नेमिसागर महराज के लगभग दस हजार उपवास पूर्ण हुए थे और चौदह सौ बावन गणधर संबंधी उपवास करने की प्रतिज्ञा उन्होंने ली।        महराज ! लगभग दस हजार उपवास करने रूप अनुपम तपः साधना करने से आपके विशुद्ध ह्रदय में भारत देश का भविष्य कैसा नजर आता है?        देश अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुष्काल, अंनाभाव आदि के कष्टों का अनुभव कर रहा है।          महराज नेमिसागर जी ने कहा- "जब भारत पराधीन था, उस समय की अपेक्षा स्वतंत्र भारत में जीववध, मांसाहार आदि तामसिक कार्य बड़े वेग से बढ़ रहे हैं। इनका ही दुष्परिणाम अनेक कष्टों का आविर्भाव तथा उनकी वृद्धि है।"
? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का*?
    ?आजकी तिथी - वैशाख कृष्ण १?

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☀देहली चातुर्मास की घटना - ३३५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,       
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती शान्तिसागर जी महराज का श्रमण संस्कृति में इतना उपकार है जिसका उल्लेख नहीं किया जा सकता। उनके उपकार का निर्ग्रन्थ ही कुछ अंशों में वर्णन कर सकते हैं।       पूज्य शान्तिसागर जी महराज ने श्रमण संस्कृति का मूल स्वरूप मुनि परम्परा को देशकाल में हुए उपसर्गों के उपरांत पुनः जीवंत किया था। यह बात लंबे समय से उनके जीवन चरित्र को पढ़कर हम जान रहे हैं। आज का भी प्रसंग उसी बात की पुष्टि करता है। *? अमृत माँ जिनवाणी से- ३३५  ?*
         *"देहली चातुर्मास की घटना*"
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के सुयोग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज ने देहली चातुर्मास की एक बात पर इस प्रकार प्रकाश डाला था-      "देहली में संघ का चातुर्मास हो रहा था। उस समय नगर के प्रमुख जैन वकील ने संघ के नगर में घूमने की सरकारी आज्ञा प्राप्त की थी। उसमें नई दिल्ली, लालकिला, जामा मस्जिद, वायसराय भवन आदि कुछ स्थानों पर जाने की रोक थी।         जब आचार्य महराज को यह हाल विदित हुआ, तब उनकी आज्ञानुसार मैं, चंद्रसागर, वीरसागर उन स्थानों पर गए थे, जहाँ गमन के लिए रोक लगा दी गई थी।         आचार्य महराज ने कह दिया था कि जहाँ भी विहार में रोक आवे, तुम वहीं बैठ जाना।        हम सर्व स्थानों पर गए। कोई रोक-टोक नहीं हुई। उन स्थानों पर पहुँचने के उपरांत फोटो उतारी गई थी, जिससे यह प्रमाणित होता था कि उन स्थानों पर दिगम्बर मुनि का विहार हो चुका हैं।"        नेमीसागर महराज ने बम्बई में उन स्थानों पर भी विहार किया है, जहाँ मुनियों के विहार को लोग असंभव मानते थे। हाईकोर्ट, समुद्र के किनारे जहाँ जहाजों से माल आता जाता है। ऐसे प्रमुख केन्दों पर भी नेमीसागर महराज गए, इसके चित्र भी खिचें हैं।         इनके द्वारा दिगम्बर जैन मुनिराज के सर्वत्र विहार का अधिकार स्पष्ट सूचित होता है। साधुओं की निर्भीकता पर भी प्रकाश पड़ता है। ? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का*?
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल पूर्णिमा?

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☀घुटने के बल पर आसन - ३३४

? *अमृत माँ जिनवाणी से - ३३४* ?      *"घुटनों के बल पर आसान"*          नेमीसागर महराज घुटनों के बल पर खड़े होकर आसान लगाने में प्रसिद्ध रहे हैं। मैंने पूंछा- "इससे क्या लाभ होता है?" उन्होंने बताया - "इस आसान के लिए विशेष एकाग्रता लगती है। इससे मन का निरोध होता है। बिना एकाग्रता के यह आसन नहीं बनता है। इसे "गोड़ासन" कहते हैं।        इससे मन इधर उधर नहीं जाता है और कायक्लेश तप भी पलता है। दस बारह वर्ष पर्यन्त मैं वह आसन सदा करता था, अब वृद्ध शरीर हो जाने से उसे करने में कठिनता का अनुभव होता है।"        मैंने पूंछा- "महराज ! गोड़ासन करते समय घुटने के नीचे कोई कोमल चीज आवश्यक है या नहीं?"        वे बोले- "मैं कठोर चट्टान पर भी आसन लगाकर जाप करता था। भयंकर से भयंकर गर्मी में भी गोड़ासन पाषाण पर लगाकर सामयिक करता था। मेरे साथी अनेक लोगों ने इस आसन का उद्योग किया, किन्तु वे सफल नहीं हुए।"          ध्यान के लिए सामान्यतः पद्मासन, पल्यंकासन और कायोत्सर्ग आसन योग्य हैं। अन्य प्रकार का आसन कायक्लेश रूप है। गोड़ासन करने की प्रारम्भ की अवस्था में घटनों में फफोले उठ आए थे। मैं उनको दबाकर बराबर अपना आसन का कार्य जारी रखता था।" ? *स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का* ?
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल त्रयोदशी?

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☀सर्वप्रथम ऐलक शिष्य - ३३३

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३३३  ?        *"सर्वप्रथम ऐलक शिष्य"*         पूज्य शान्तिसागर जी महराज के सुशिष्य नेमीसागर जी महराज ने बताया कि- "आचार्य महराज जब गोकाक पहुँचे तब वहाँ मैंने और पायसागर ने एक साथ ऐलक दीक्षा महराज से ली। उस समय आचार्य महराज ने मेरे मस्तक पर पहले बीजाक्षर लिखे थे। मेरे पश्चात पायसागर के दीक्षा के संस्कार हुए थे।     *"समडोली में निर्ग्रन्थ दीक्षा*"           "दीक्षा के दस माह बाद मैंने समडोली में निर्ग्रन्थ दीक्षा ली थी। वहाँ आचार्य महराज ने पहले वीरसागर के मस्तक पर बीजाक्षर लिखे थे, पश्चात मेरे मस्तक पर लिखे थे। इस प्रकार मेरी और वीरसागर की समडोली में एक साथ मुनि दीक्षा हुई थी। वहाँ चंद्रसागर ऐलक बने थे।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल द्वादशी?

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☀पिताजी से चर्चा - ३३२

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३३२  ?
                *पिताजी से चर्चा*
      पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के सुयोग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज द्वारा उनके मोक्षमार्ग में प्रवृत्ति का वृतांत ज्ञात हुआ। गृहस्थ जीवन के बारे में उन्होंने बताया कि-    "एक दिन मैंने अपने पिताजी से कुड़ची में कहा- "मैं चातुर्मास में महराज के पास जाना चाहता हूँ।"        वे बोले -"तू चातुर्मास में उनके समीप जाता है, अब क्या वापिस आएगा? "पिताजी मेरे जीवन को देख चुके थे, इससे उनका चित्त कहता था कि आचार्य महराज का महान व्यक्तित्व मुझे सन्यासी बनाए बिना नहीं रहेगा। यथार्थ में हुआ भी ऐसा।"
            *जीवनधारा में परिवर्तन*         "चार माह के सत्संग ने मेरी जीवन धारा बदल दी। मैंने महराज से कहा- "महराज ! मेरे दीक्षा लेने के भाव हैं। अपने कुटुम्ब से परवानगी लेने का विचार नहीं है। घर वाले कैसे मंजूरी देंगे? मुफ्त में नौकर मिलता है, जो कुटुम्ब की सेवा करता रहता है, तब फिर परवानगी कौन देगा?"        महराज ने कहा- "ऐसा शास्त्र में कहा है कि आत्मकल्याण के हेतु आज्ञा प्राप्त करना परम आवश्यक नहीं है।"      "नेमीसागर जी ने बताया कि मेरे दीक्षा लेने के भाव अठारह वर्ष की अवस्था में ही उत्पन्न हो चुके थे। उसके पूर्व की मेरी कथा विचित्र थी।"   यह कथा प्रसंग क्रमांक ३३० में भेजी गई थी। पुनः प्रेषित करता हूँ?? *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
    ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल ११?

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☀परिचय -३३१

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३१ ?                    *परिचय*
        पंडित श्री दिवाकर जी ने लिखा कि पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य मुनिश्री १०८ नेमीसागर जी महराज महान तपस्वी हैं।       नेमीसागर जी महराज ने बताया कि "हमारा और आचार्य महराज का ५० वर्ष पर्यन्त साथ रहा। चालीस वर्ष के मुनिजीवन के पूर्व मैंने गृहस्थ अवस्था में भी उनके सत्संग का लाभ लिया था।        आचार्य महराज कोन्नूर में विराजमान थे। वे मुझसे कहते थे- "तुम शास्त्र पढ़ा करो। मैं उनका भाव लोगों को समझाऊँगा।"         वे मुझे और बंडू को शास्त्र पढ़ने को कहते थे। मैं पाँच कक्षा तक पढ़ा था। मुझे भाषण देना नहीं आता था। शास्त्र बराबर पढ़ लेता था, इससे महराज मुझे शास्त्र बाचने को कहते थे। मेरे तथा बंडू के शास्त्र बाँचने पर जो महराज का उपदेश होता था, उससे मन को बहुत शांति मिलती थी।           अज्ञान भाव दूर होता था। ह्रदय के कपाट खुल जाते थे। उनका सत्संग मेरे मन में मुनि बनने का उत्साह प्रदान करता था। मेरा पूरा झुकाव गृह त्यागकर साधु बनने का हो गया था।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
 ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल दशमी?

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☀पूर्व जीवन में मुस्लिम प्रभाव - ३३०


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         कल से हमने पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य महान तपस्वी नेमीसागर जी महराज के जीवन चरित्र को जानना प्रारम्भ किया था।         आज के प्रसंग को जानकर हम सभी को ज्ञात होगा कि जीव कैसे-कैसे वातावरण से निकल कर मोक्ष मार्ग में लग सकता है। ? *अमृत माँ जिनवाणी से - ३३०*  ?       *"पूर्व जीवन में मुस्लिम प्रभाव"*
       पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य नेमीसागर जी महराज का पूर्व जीवन सचमुच में आश्चर्यप्रद था। उन्होंने यह बात बताई थी -      "मैं अपने निवास स्थान कुड़ची ग्राम में मुसलमानों का स्नेह पात्र था। मैं मुस्लिम दरगाह में जाकर पैर पड़ा करता था। सोलह वर्ष की अवस्था तक मैं वहाँ जाकर उदबत्ती जलाता था। शक्कर चढ़ाता था।"       "जब मुझे अपने धर्म की महिमा का ज्ञान हुआ, तब मैंने दरगाह आदि की तरफ जाना बंद कर दिया। मेरा परिवर्तन मुसलमानों को सहन नहीं हुआ। वे लोग मेरे विरुद्ध हो गए और मुझे मारने का विचार करने लगे।"         *"ऐनापुर में स्थान परिवर्तन*"          "ऐसी स्थिति में अपनी धर्म-भावना के रक्षण के निमित्त मैं कुचडी से चार मील की दूरी पर स्थित ऐनापुर ग्राम में चला गया। वहाँ के पाटील की धर्म में रुचि थी। वह हम पर बहुत प्यार करता था। इससे मैंने ऐनापुर में ही रहना ठीक समझा।"
*? स्वाध्याय चा.चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल नवमी?

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☀जीवन में उपवास साधना - 329


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        चारित्र चक्रवर्ती पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के जीवन चरित्र की प्रस्तुती की इस श्रृंखला में प्रस्तुत किए शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य मुनिश्री पायसागर जी महराज के जीवन चरित्र को सभी ने बहुत ही पसंद किया तथा सभी के जीवन को प्रेरणादायी जाना।         आज से पूज्य पायसागर जी महराज की भांति आश्चर्य जनक जीवन चरित्र के धारक पूज्य नेमीसागर जी महराज के जीवन चरित्र की कुछ प्रसंगों में प्रस्तुती की जायेगी। *? अमृत माँ जिनवाणी से - ३२९  ?*         
          *"जीवन में उपवास साधना"*
        पूज्य चारित्र चक्रवर्ती आचार्यश्री शान्तिसागर जी महराज के योग्य शिष्य पूज्य नेमीसागर जी महराज के दीक्षा के ४४ वर्ष ही हो गए एक उपवास, एक आहार का क्रम प्रारम्भ से चलता आ रहा है। इस प्रकार उनका नर जन्म का समय उपवासों में व्यतीत हुआ। उन्होंने तीस चौबीसी व्रत के ७२० उपवास किए।  कर्मदहन के १५६ तथा चारित्रशुद्धि व्रत के १२३४ उपवास किए।  दशलक्षण के ५ बार १०-१० उपवास किये। अष्टान्हिका में तीन बार ८-८ उपवास किए। लोणंद में महराज नेमीसागर ने सोलहकारण के १६ उपवास किए थे।       इस प्रकार उनकी तपस्या अद्भुत रही है। २, ३, ४ उपवास तो वह जब चाहे तब करते थे।
*? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल अष्टमी?

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☀नवधाभक्ति - 328

?  अमृत माँ जिनवाणी से - ३२८  ?
          *"नवधा भक्ति का कारण"*
       आचार शास्त्र पर पूज्य आचार्य श्री शान्तिसागर जी महराज का असाधारण अधिकार था, यही कारण है कि सभी उच्च श्रेणी के विद्वान आचार शास्त्र की शंकाओं का समाधान आचार्य महराज से प्राप्त करते थे। आचार्यश्री की सेवा में रहने से अनेक महत्व की बातें ज्ञात हुआ करती थी।      शास्त्र में कथित नवधा-भक्ति के संबंध में आचार्यश्री ने कहा था- "नवधा भक्ति अभिमान-पोषण के हेतु नहीं है। वह धर्म रक्षण के लिए है। उससे जैनी की परीक्षा होती है। अन्य लोग धोखा नहीं दे सकते हैं।" *? स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*
    ?आजकी तिथी - चैत्र शुक्ल ७?

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☀शरीरविस्मृति - 327

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३२७  ?                     *शरीरविस्मृति*
        सन् १९५२ के आरम्भ में पूज्य आचार्य महराज शान्तिसागर जी महराज दहीगाँव नाम के तीर्थक्षेत्र में विराजमान थे। एक दिन वहाँ के मंदिर से दूसरी जगह जाते हुए उनका पैर ठीक सीढ़ी पर न पड़ा, इसलिए वे जमीन पर गिर पड़े।        यह तो बड़े पुण्य की बात थी कि वह प्राण लेने वाली दुर्घटना एक पैर में गहरा घाव ही दे पाई। महराज के पैर में डेढ़ इंच गहरा घाव हो गया, जिसमें एक बादाम सहज ही समा सकती थी। उस स्थिति में महराज ने पैर में किसी प्रकार की पट्टी वगैरह नहीं बंधवाई, एक साधारण सी निर्दोष औषधि पैर में लगती थी।           उनके पास सिवनी से दो व्यक्ति दर्शनार्थ पहुँचे थे। उन्होंने आकर हमें सुनाया कि महराज के पास हमें तीन चार घंटे रहने का सौभाग्य मिला था। उस समय हम लोगों ने यह विलक्षण बात देखी कि पैर में भयंकर चोट होते हुए भी उन्होंने हमारे सामने एक बार भी अपने पैर के घाव की ओर दृष्टि नहीं दी।         उनकी शरीर के प्रति कितनी निर्ममता थी इसका ज्ञान उनके पैर के घाव के प्रति उपेक्षा भाव से स्पष्ट होता था। *?स्वाध्याय चा. चक्रवर्ती ग्रंथ का ?*

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☀आज ११ नवंबर दिन शुक्रवार, कार्तिक शुक्ल ग्यारस की शुभ तिथी को १८ वें तीर्थंकर *देवादिदेव श्री १००८ अरहनाथ भगवान* का *ज्ञान कल्याणक* पर्व है।

*?  आज ज्ञान कल्याणक पर्व है  ?*
जय जिनेन्द्र बंधुओं,    
          आज ११ नवंबर दिन शुक्रवार, कार्तिक शुक्ल ग्यारस की शुभ तिथी को १८ वें तीर्थंकर *देवादिदेव श्री १००८ अरहनाथ भगवान* का *ज्ञान कल्याणक* पर्व है। ??
आज अत्यंत भक्तिभाव से अरहनाथ भगवान की पूजन कर भगवान का गर्भ कल्याणक पर्व मनाएँ। ??
जो श्रावक पंचकल्याणक के व्रत करते हैं कल उनके व्रत का दिन है।
*?? आचार्यश्री विद्यासागर सेवासंघ ??*

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☀आज ६ नवंबर दिन रविवार, कार्तिक शुक्ल छठवी की शुभ तिथी को २२ वें तीर्थंकर *देवादिदेव श्री १००८ नेमिनाथ भगवान* का *गर्भ कल्याणक* पर्व है

*?    आज गर्भ कल्याणक पर्व है    ?*
जय जिनेन्द्र बंधुओं,    
          आज ६ नवंबर दिन रविवार, कार्तिक शुक्ल छठवी की शुभ तिथी को २२ वें तीर्थंकर *देवादिदेव श्री १००८ नेमिनाथ भगवान* का *गर्भ कल्याणक* पर्व है। ??
आज अत्यंत भक्तिभाव से नेमिनाथ भगवान की पूजन कर भगवान का गर्भ कल्याणक पर्व मनाएँ। ??
जो श्रावक पंचकल्याणक के व्रत करते हैं कल उनके व्रत का दिन है।
*?? आचार्यश्री विद्यासागर सेवासंघ ??*

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आज के प्रश्न क्र 482

आओ करे चरण बंदन
(१) सम्मेदशिखर  पहाड़ी में कितने तीर्थंकरो के चरण हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(२) गिरनार जी में 5वे पर्वत पर किसके चरण हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(३) कुण्डलपुर में किस केवली के चरण हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(४) चम्पापुर के जल मंदिर में किसके चरण कमल हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(५) चरण किसके प्रतिक हे 
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(६) आनंद कूट पर किसके चरण हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(७) नेमिनाथ भगवान् की टोक पर कितने चरण बने हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(८) पाँच चरण किस टोक पर हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(९) गौतमस्वामी की टोक पर कितने चरण बने हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(१०) ऐसे तीर्थंकर का नाम जिनके कारण दो स्थानों पर हे
☁☁☁☁☁☁☁☁
(११) सबसे बड़े दर्शन किस तीर्थंकर के बने
उत्तर 
☁☁☁☁☁☁☁☁
(१२) शिखर से मोक्ष अंतिम तीर्थंकर के चरण किसके हे
उत्तर -
☁☁☁☁☁☁☁☁
(१३) शिखर जी बंदना कितने किलो मीटर की हे
उत्तर -
 

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आज के प्रश्न - क्र 481

(१) किस स्थान पर गाय ने दूध गिराया था
उत्तर- (२) किस स्थान पर नेमिनाथ को वैराग्य हुआ था
उत्तर - (३) किस स्थान पर गजकुमार मुनि पर उपसर्ग हुआ
उत्तर - (४) किस स्थान पर आत्मा ही आत्मा है
उत्तर - (५) किस स्थान पर नपुंसक ही नपुंसक हे
उत्तर - (६) किस स्थान पर महावीर स्वामी को मोक्ष हुआ
उत्तर - (७) किस स्थान पर आदिनाथ जी का जन्म हुआ
उत्तर - (८) किस स्थान पर बाहुबली की सुन्दर प्रतिमा है 
उत्तर - (९) किस स्थान पर बड़ेबाबा विराजमान है
उत्तर - (१०) किस स्थान पर विद्याधर की दीक्षा हुई 
उत्तर - (११) किस स्थान पर विद्यासागर जी ने 25 मुनि दीक्ष दी
उत्तर  (१२) किस स्थान पर महावीर की प्रथम देशना हुई थी
उत्तर (१३) किस स्थान पर अटलविहारी  वाजपेयी ने आचार्य विद्या सागर जी के दर्शन किये
उत्तर   

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संसार की सभी वस्तु नाशवान है फिर उनसे प्रीति किस लिए

पुनः आचार्य योगीन्दु दृढ़तापूर्वक मोक्षमार्ग में प्रीति करने के लिए समझाते हैं कि यहाँ संसार में कोई भी वस्तु शाश्वत नहीं है, प्रत्येक वस्तु नश्वर है, फिर उनसे प्रीति किस लिए ? क्योंकि प्रिय वस्तु का वियोग दुःखदायी है और वियोग अवश्यंभावी है। जाते हुए जीव के साथ जब शरीर ही नहीं जाता तो फिर संसार की कौन सी वस्तु उसके साथ जायेगी। अतःः सांसारिक वस्तुओं से प्रीति के स्थान पर मोक्ष में प्रीति ही हितकारी है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा 129.   जोइय सयलु वि कारिमउ णिक्कारिमउ ण कोइ।        जीविं जंतिं कुडि ण गय इहु पडिछन्दा जोइ।। अर्थ -हे योगी! यहाँ प्रत्येक (वस्तु) कृत्रिम (नाशवान) है, कोई भी (वस्तु) अकृत्रिम (अविनाशी) नहीं है। जाते हुए जीव के साथ शरीर (कभी भी) नहीं गया, इस समानता (उदाहरण) को तू समझ। शब्दार्थ - जोइय- हे योगी, सयलु-प्रत्येक, वि-ही, कारिमउ-कृत्रिम, णिक्कारिमउ-अकृत्रिम, ण -नहीं, कोइ-कोई भी, जीविं-जीव के साथ, जंतिं -जाते हुए, कुडि-शरीर, ण-नहीं, गय-गया, इहु- इस, पडिछन्दा-समानता को, जोइ-समझ।    

Sneh Jain

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मोक्ष मार्ग में प्रीति ही मनुष्य जीवन का सार है

आचार्य योगीन्दु कहते हैं कि सभी प्रकार के जीवों में मनुष्य ही श्रेष्ठ जीव है। जीवन में सुख-शान्ति का मतलब जितना वह समझ सकता है उतना कोई तिर्यंच आदि जीव नहीं। किन्तु देखने को यह मिलता है कि मनुष्य ही सबसे अशान्त जीव है। आचार्य ऐसे अशान्त जीव को शान्ति का मार्ग बताते हुए कहते हैं कि तू सांसारिक सुखों में उलझकर मोक्ष मार्ग को मत छोड़। मोक्ष का तात्पर्य शब्द कोश में शान्ति, दुःखों से निवृत्ति ही मिलता है। आचार्य के अनुसार जब हमारे जीवन का ध्येय शान्ति की प्राप्ति होगा तो हम सांसारिक सुखों को सही रूप में भोगते हुए भी उनमें भटकेंगे नहीं। जब हमारा ध्येय शान्ति की प्राप्ति होगा तब तदानुरूप ही हमारी क्रिया होगी। अतः शुद्ध मोक्षमार्ग में प्रीति आवश्यक है। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 128.  मूढा सयलु वि कारिमउ भुल्लउ मं तुस कंडि।       सिव-पहि णिम्मलि करहि रइ घरु परियणु लहु छंडि।। अर्थ - हे मूर्ख! यह समस्त जगत ही कृत्रिम है,(सांसारिक सुखों में) भटका हुआ तू भूसी को कूटकर भूसी अलग मत कर। (समय व्यर्थ बरबाद मत कर) । घर, (और) परिवार को छोड़कर शुद्ध मोक्ष मार्ग में प्रीति कर। शब्दार्थ -मूढा - हे मूर्ख, सयलु-समस्त, वि-ही, कारिमउ-कृत्रिम, भुल्लउ-भटका हुआ, मं-मत, तुस-भूसी को, कंडि-कूटकर भूसी अलग कर, सिव-पहि-मोक्ष मार्ग में, णिम्मलि-शुद्ध, करहि -कर, रइ -प्रीति, घरु -घर, परियणु-परिवार, लहु-शीघ्र, छंडि-छोड़कर।    

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अहिंसा ही सुख व शान्ति का मार्ग है

इस दोहे में आचार्य योगीन्दु स्पष्टरूप में घोषणा करते हैं कि हे प्राणी! यदि तू बेहोशी में जीकर इतना नहीं सोचेगा कि मेरे क्रियाओं से किसी को कोई पीड़ा तो नहीं पहुँच रही है तो तू निश्चितरूप से नरक के समान दुःख भोगेगा। इसके विपरीत यदि तेरी प्रत्येक क्रिया इतनी जागरूकता के साथ है कि तेरी क्रिया से किसी भी प्राणी को तकलीफ नहीं पहुँचती तो तू निश्चितरूप से स्वर्ग के समान सुख प्राप्त करेगा। यह कहकर आचार्य योगीन्दु बडे़ प्रेम से कहते हैं कि देख भाई मैंने तूझे सुख व दुःख के दो मार्गों को अच्छी तरह से समझा दिया है, अब तुझे जो सही लगे वही कर। देखिये इससे सम्बन्धित आगे का दोहा - 127.   जीव वहंतहँ णरय-गइ अभय-पदाणे ँ सग्ग।        बे पह जवला दरिसिया जहि ँ रुच्चइ तहि ँ लग्गु।। अर्थ -  जीवों का वध करते हुओं को नरकगति (मिलती है), (तथा) अभय दान से स्वर्ग (मिलता है)।    (ये) दो मार्ग समुचित रूप से (तुझकोे) बताये गये हैं, जिसमें तुझे अच्छा लगता है उसमें दृढ़ हो। शब्दार्थ - जीव-जीवों का, वहंतहँ-वध करते हुओं को,  णरय-गइ-नरक गति, अभय-पदाणे ँ -अभय दान से स्वर्ग, सग्ग-स्वर्ग, बे -दो, पह -मार्ग, जवला-समुचित, दरिसिया-बताये गये हैं, जहि ँ-जिसमें,  रुच्चइ -अच्छा लगता है, तहि ँ-उसमें, लग्गु-दृढ़ हो।  

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