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धर्ममाता श्री चिरोज़ा बाई जी -१६

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,         बहुत मार्मिक है आत्मकथा की प्रस्तुती का आज का यह खंड। निश्चय ही यह पढ़कर आप विशिष्ट आनंद का अनुभव करेंगे।         यहाँ आपको देखने मिलेगा गणेशप्रसाद की धार्मिक आस्था के प्रति दृढ़ता तथा चिरौंजाबाईजी का साधर्मी बालक के प्रति ममत्व, उनकी सरलता तथा विशाल हृदयता। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?       *"धर्ममाता श्री चिरौंजाबाई जी"*                        क्रमांक - १६                                        मैं फिर भी नीची दृष्टि किये चुपचाप

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धर्ममाता श्री चिरोज़ा बाई जी -१५

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,            आत्मकथा के आज के वर्णन से उन महत्वपूर्ण महिला का भी वर्णन प्रारम्भ हो रहा है जिनका जैनधर्म की पताका फहराने वाले गणेश प्रसाद जी वर्णी के धर्म-ध्यान में विशेष योगदान रहा है। वह महिला है वर्णीजी की धर्ममाता चिरौंजा बाईजी।           जिनधर्म के सम्बर्धन में पूज्य वर्णीजी का बड़ा योगदान है तो वर्णीजी की धर्मसाधना में बाईजी का बहुत बड़ा सहयोग रहा है।        बाई एक अत्यंत धार्मिक महिला थी। ऐसी विरली ही माँ होती हैं जो अपने पुत्र का पालन पोषण तो करती है साथ ह

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मार्गदर्शक कडोरेलालजी भाई जी - १४

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,                       किसी के जीवन में बिना किसी उपदेश अथवा प्रेरणा के जिनधर्म के प्रति ऐसी श्रद्धा कि जिनधर्म ही हमारा कल्याण सकता है यह बात पूज्य वर्णी के जीवन को देखकर भली प्रकार स्पष्ट होता है।     आत्मकथा के पिछले वर्णन में हमने देखा कि वर्णीजी द्वारा अपनी धर्मपत्नी व माँ का जिनधर्म के आचरण हेतु परित्याग को देखकर भायजी के कहने पर उन्होंने अपनी माँ और पत्नी को अपने पास रहने हेतु बुलाया।       वर्णीजी का अपनी माँ को पत्र उनकी दृढ़ जिनआस्था का स्पष्ट परिचायक

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मार्गदर्शक कडोरेलालजी भाई जी - १३

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,              कल के उल्लेख में हमने देखा की गणेशप्रसाद जी ने जिनधर्म के अनुसार आचरण की इच्छा के कारण अपनी माँ तथा पत्नी का परित्याग करने के लिए तत्पर थे।        कड़ोरेलाल जी भाईजी ने उनको इस अविवेकपूर्ण कार्य पर समझाया। इसी कथन का उल्लेख है।       भायजी की आज्ञा के अनुसार उन्होंने अपनी माँ तथा पत्नी को पत्र लिखा उसका वर्णन कल प्रस्तुत किया जायेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?     *"मार्गदर्शक कड़ोरेलालजी भायजी"*                      

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मार्गदर्शक कडोरेलालजी भाई जी - १२

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           आत्मकथा प्रस्तुती में आज का खंड हमारी संवेदना को छूने वाला है। जिनधर्म पर श्रद्धा को आधार पर गणेश प्रसाद जी अपनी माँ तथा पत्नी का परित्याग हेतु तत्पर हो गए।         श्रद्धा का प्रवाह तो था मगर उस समय विवेक का अभाव था जो उन्होंने अपने परिजनों से ऐसा व्यवहार किया। इस बात को वर्णी जी ने स्वयं स्पष्ट किया है।             आत्मकथा के इन खंडों से गणेशप्रसादजी का जिनधर्म के प्रति दृढ़ श्रद्धान का परिचय अवश्य मिल रहा है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्ण

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मार्गदर्शक कडोरेलालजी भाई जी - ११

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,            आज के उल्लेख से आपको वर्णी का धर्म मार्ग में आरोहण के प्रयासों का वृत्तांत जानने को मिलेगा।            वर्णीजी का सम्पूर्ण जीवन हम सभी के लिए प्रेरणास्पद है। वर्तमान में जो उल्लेख चल रहा है वह गणेश प्रसाद का वर्णन है, वर्णी उपाधि तो उनके साथ बाद में जुड़ी। हाँ इस प्रसंग में उल्लखित मोतीलाल जी वर्णी एक अन्य विद्धवान श्रावक थे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?     *"मार्गदर्शक कड़ोरेलालजी भायजी"*                      क्रमांक - ११    

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मार्गदर्शक कडोरेलालजी भाई जी - १०

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,        धर्मात्मा जीवों का पुरुषार्थ देखो, अजैन कुल में जन्म के उपरांत भी संघर्षों के साथ अपनी शुद्ध परिणति की दिशा में आगे बढ़ते गए। उनकी इस दृढ़ता से उनकी भवितव्यता का परिचय मिलता है। महापुरुषों में ऐसी असामान्य बातें देखने को मिलती हैं।       आज के उल्लेख में आप देखेंगे की वर्णी जी ने शुद्ध आहार के जैन संस्कारस्वरूप अपनी जातिगत लोगों के मध्य भोजन करना अनुचित समझा भले ही उन्होंने जाति से निष्कासित होना स्वीकार किया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?    

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जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण -९

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,         आज के वर्णन में आप वर्णी जी के प्रारंभिक जीवन में पिता के देहांत के उपरांत का वर्णन है। यही से हम सभी वर्णी जी के संघर्ष का जीवन देखेंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?  *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                      क्रमांक - ९                 मेरे पिता ही व्यापार करते थे, मैं तो बुद्धू था ही - कुछ नहीं जनता था। अतः पिता के मरने के बाद मेरी माँ बहुत व्यथित हुईं। इससे मैंने मदनपुर गाँव में मास्टरी कर ली।        वहाँ चार मास र

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जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण -८

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       आत्मकथा के कुछ अंश की आजकी प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी को उनके पिता द्वारा अत्यंत लाभकारी उपदेश का वर्णन है। वर्णी जी के पिता ने उनके लिए यह उपदेश दिया था लेकिन यह हम सभी के लिए भी कल्याणकारी है।        इसके अलावा भी उनके पिता तथा दादा की मृत्यु के क्षणों का वर्णन है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?  *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                      क्रमांक - ८                  स्वर्गवास के समय उन्होंने मुझे यह उपदेश दिया कि -

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -४०

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       अद्भुत भावाभिव्यक्ति पूज्य वर्णीजी की श्री वीर प्रभु के चरणों में।       मैं पूर्ण विश्वास के साथ कर सकता हूँ स्वाध्याय की रुचि रखने वाला हर एक श्रावक जो प्रस्तुत भावों को ध्यानपूर्वक पढ़ता है वह अद्भुत अभिव्यक्ति कहे बिना रहेगा ही नहीं।        आत्मकथा प्रस्तुती का यह प्रारंभिक चरण ही है इतने में ही हम पूज्य वर्णीजी के भावों की गहराई से उनका परिचय पाने लगे हैं।       उनकी आत्मकथा ऐसे ही तत्वपरक उत्कृष्ट भावों से भरी पढ़ी है। निश्चित ही वर्णीजी की आत्

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ७

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,      आज के वर्णन में आपको वर्णीजी के जीवन की णमोकार महामंत्र के माहात्म्य की बहुत बड़ी घटना पढ़ने मिलेगी। ऐसी महिमा युक्त घटनाएँ सामान्यतः प्रथमानुयोग के ग्रंथों में पढ़ते थे जबकि यह घटना मात्र लगभग १५० पुरानी है।        हम जैन होकर भी मंत्र के माहात्म्य में श्रद्धा नहीं रख पाते जबकि वर्णी जी के पिताजी के जीवन में जैन धर्म के प्रति श्रद्धा का आधार यही थी।        कल हम वह वर्णीजी के पिता का अपने बेटे के लिए वह महत्वपूर्ण संदेश पढ़ेंगे, शायद ऐसा महत्वपूर्ण संदेश

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ६

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज के प्रसंग में जैनेत्तर कुल में जन्में बालक गणेश प्रसाद के जिन धर्म के प्रति श्रद्धान को जानकर सोचेंगे इसे कहते है जिनधर्म की सच्ची श्रद्धा। यह तो शुरुबात है आगे वर्णी के पूरे जीवन में जिन धर्म के प्रति सच्ची व दृढ़ श्रद्धा देखने को मिलेगी।        आज का प्रकरण भी बहुत रोचक है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?  *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                      क्रमांक - ६            मेरे कुल में यज्ञोपवीत संस्कार होता थ

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ५

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,          आज के उल्लेख मैं आप देखेंगे कि कितना गहरी श्रद्धा थी एक अजैन बालक में जिन धर्म के प्रति। अपनी जातिगत मान्यताओं के हटकर किसी अन्य धर्म के प्रति इतनी आस्था!        कहते हैं पूत के गुण पालने में दिखते हैं। जिनधर्म के प्रति इतना श्रद्धान, इतनी आस्था को देखकर उस समय वर्णीजी के भविष्य को कोई कहने वाला हो ना हो लेकिन हम पाठक जरूर कह सकते हैं कि जिनधर्म के प्रति गहरी आस्था वाला वह बालक सामान्य नहीं था वह अवश्य ही ऐसे महान धर्म का मर्मज्ञ अवश्य बनेगा।    

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ४

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           पूज्य वर्णी द्वारा वर्णित उनके जीवन की हर एक बात का वर्णन अत्यंत रोचकता तथा आनंद लिए हुए है।         आज के वर्णन में आप देखेंगे की अजैन कुल में जन्म होने के उपरांत भी जैन धर्म की पताका को सर्वत्र फहराने का श्रेय रखने वाले बालक गणेश प्रसाद के जीवन में जैनत्व के संस्कारों का बीजारोपण कैसे हुआ।       उस भव्य आत्मा की उपादान शक्ति देखो जो रावण के व्रत के प्रसंग पर रात्रि भोजन त्याग का इतना बड़ा संकल्प ले लिया। यहाँ उस समय के लोगों के सहज स्वभाव तथा धा

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - ३

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,         कल हमने देखा की पूज्य गणेश प्रसाद जी वर्णी का जन्म सवत १९३१ अर्थात सन् १८७४ में हसेरा नामक ग्राम में हुआ था।          वर्णीजी द्वारा वर्णित उनकी बाल्यावस्था के समय उस क्षेत्र में लोगों के आचार-विचार तथा जीवन शैली का वर्णन निश्चित ही हम पाठकों के ह्रदय को छूने वाली है। कितना सरल व सहज तथा आनन्दप्रद जीवन था उस समय के लोगों का।       कल की प्रस्तुत सामग्री से एक महत्वपूर्ण बात हम सभी को जानने को मिली, उस समय लोग आपने हाथों से ही अपने खेतों में उगने वा

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☀जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण - २

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?  *"जन्म और जैनत्व की ओर आकर्षण"*                प्रस्तुती क्रमांक -२                   मेरा नाम गणेश वर्णी है। जन्म संवत् १९३१, कुवाँर वदि ४ को हसेरा ग्राम में हुआ था। यह जिला ललितपुर (झाँसी), तहसील महरोनी के अंतर्गत मदनपुर थाने में स्थित है।       पिता का नाम श्री हीरालालजी माता का नाम उजियारी था। मेरी जाति असाटी थी। यह प्रायः बुंदेलखंड में पाई जाती है। इस जाति वाले वैष्णव धर्मानुयायी होते हैं।      मेरे पिताजी की स्थिति सामान्य

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☀अपनी बात -१

☀☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,       आज से जैन संस्कृति के महान संवर्धक पूज्य गणेश प्रसादजी वर्णी की जीवनी को उनकी ही आत्मकथा के अनुसार प्रस्तुत करने जा रहा हूँ।         पूज्य गणेश प्रसाद जी एक ऐसे महापुरुष थे जिन्होंने अजैन कुल में जन्म होने के बाद भी, अत्यंत संघर्ष पूर्ण जीवन के साथ ऐसे समय में जैन संस्कृति का संवर्धन किया जब देश जैन धर्म को जानने वाले विद्धवान बहुत ही कम थे। वर्तमान में इतनी आसानी बड़े-२ ग्रंथों का अध्यापन हेतु विद्धवान उपलब्ध है यह वर्णी जी का उपकार कहा जा सकता है।

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३९

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी श्री वीरप्रभु के चरणों में जो चिंतन कर रहे थे वह अंश यहाँ प्रस्तुत है। बहुत ही सुंदर तत्वपरक चिंतन है।        निरंतर स्वाध्याय की रुचि रखने वाले पाठक पूज्य वर्णीजी के तत्वचिंतन से आनंदानुभूति कर रहे होंगे। अन्य पाठक भी श्रद्धा पूर्वक अवश्य पढ़ें क्योंकि जिनेन्द्र भगवान प्रणीत तत्वों की अभिव्यक्ति संसार के सर्वोत्कृष्ट आनंद का अनुभव कराने वाली होती है।      अगली प्रस्तुती में भी इसी के शेष अंश का वर्णन रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसा

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३८

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                  

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☀रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर -३७

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                  

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☀उपवास तथा महराज के विचार - ३३६

? अमृत माँ जिनवाणी से - ३३६  ?        *उपवास तथा महराज के विचार*           सन १९५८ के व्रतों में १०८ नेमिसागर महराज के लगभग दस हजार उपवास पूर्ण हुए थे और चौदह सौ बावन गणधर संबंधी उपवास करने की प्रतिज्ञा उन्होंने ली।        महराज ! लगभग दस हजार उपवास करने रूप अनुपम तपः साधना करने से आपके विशुद्ध ह्रदय में भारत देश का भविष्य कैसा नजर आता है?        देश अतिवृष्टि, अनावृष्टि, दुष्काल, अंनाभाव आदि के कष्टों का अनुभव कर रहा है।          महराज नेमिसागर जी ने कहा- "जब भारत

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☀देहली चातुर्मास की घटना - ३३५

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,                पूज्य चारित्र चक्रवर्ती शान्तिसागर जी महराज का श्रमण संस्कृति में इतना उपकार है जिसका उल्लेख नहीं किया जा सकता। उनके उपकार का निर्ग्रन्थ ही कुछ अंशों में वर्णन कर सकते हैं।       पूज्य शान्तिसागर जी महराज ने श्रमण संस्कृति का मूल स्वरूप मुनि परम्परा को देशकाल में हुए उपसर्गों के उपरांत पुनः जीवंत किया था। यह बात लंबे समय से उनके जीवन चरित्र को पढ़कर हम जान रहे हैं। आज का भी प्रसंग उसी बात की पुष्टि करता है। *? अमृत माँ जिनवाणी से- ३३५  ?*

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☀घुटने के बल पर आसन - ३३४

? *अमृत माँ जिनवाणी से - ३३४* ?      *"घुटनों के बल पर आसान"*          नेमीसागर महराज घुटनों के बल पर खड़े होकर आसान लगाने में प्रसिद्ध रहे हैं। मैंने पूंछा- "इससे क्या लाभ होता है?" उन्होंने बताया - "इस आसान के लिए विशेष एकाग्रता लगती है। इससे मन का निरोध होता है। बिना एकाग्रता के यह आसन नहीं बनता है। इसे "गोड़ासन" कहते हैं।        इससे मन इधर उधर नहीं जाता है और कायक्लेश तप भी पलता है। दस बारह वर्ष पर्यन्त मैं वह आसन सदा करता था, अब वृद्ध शरीर हो जाने से उसे करने में कठिनता का अनु

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