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प्राणरक्षा - अमृत माँ जिनवाणी से - २३

?     अमृत माँ जिनवाणी से - २३     ?                     "प्राणरक्षा"           १९५२ को ग्रन्थ के लेखक ने आचार्य शान्तिसागरजी महाराज के बारे मे जानने हेतु उनके गृहस्थ जीवन के छोटे भाई के पुत्र से मिले।उन्होंने बताया-        महाराज की दुकान पर १५-२० लोग शास्त्र सुनते थे।मलगौड़ा पाटिल उनके पास शास्त्र सुनने रोज आता था। एक रात वह शास्त्र सुनने रोज आता था। एक रात शास्त्र सुनने नहीं आया, तब शास्त्र चर्चा के पश्चात महाराज उनके घर गये, वहाँ नहीं मिलने से रात में ही उनके खेत पर पहुँच

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जिन प्रभाव की महिमा - अमृत माँ जिनवाणी से - २२

?     अमृत माँ जिनवाणी से - २२     ?             "जिन प्रभाव की महिमा"                 एक बार लेखक ने पूज्य आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज से पूंछा -            महाराज जिनेन्द्र भगवान का नाम, भाव को बिना समझे भी जपने से क्या जीव के दुःख दूर होते हैं?यदि जिनेन्द्र गुण स्मरण से कष्टो का निवारण होता है, तो इसका क्या कारण है?      आचार्य महाराज ने उत्तर दिया -           जिस प्रकार अग्नि के आने से नवनीत द्रवीभूत हो जाता है, उसी प्रकार वीतराग भगवान के नाम के प्रभाव

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लोकोत्तर व्यक्तित्व - अमृत माँ जिनवाणी से - २१

?    अमृत माँ जिनवाणी से - २१    ?               "लोकोत्तर व्यक्तित्व"                  अक्टूबर सन १९५१ में बारामती के उद्यान में लेखक ने उनके छोटे भाई के साथ बड़ी विनय के साथ, आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज से उनकी कुछ जीवन गाथा जानने की प्रार्थना की, तब उत्तर मिला कि हम संसार के साधुओ में सबसे छोटे हैं, हमारा लास्ट नंबर है, उससे तुम क्या लाभ ले सकोगे? हमारे जीवन में कुछ भी महत्व की बात नहीं है।     लेखक ने कहा महाराज आपका साधुओ में प्रथम स्थान है या अंतिम, यह बात देखने वाले

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पंचमकाल में मुनियों की अल्प तपस्या द्वारा महान निर्जरा - अमृत माँ जिनवाणी से - २०

?     अमृत माँ जिनवाणी से - २०    ?    पंचमकाल में मुनियो की अल्प तपस्या्                               द्वारा महान निर्जरा       जो व्यक्ति यह सोचता हो कि आज चतुर्थ कालीन मुनियो के समान कठोर तपस्वी जीवन व्यतीत करना अशक्य होने के कारण कर्मो की निर्जरा कम होती होगी, उसे आचार्य देवसेन के ये शब्द बड़े ध्यान पढ़ना चाहिए-           "पहले हजार वर्ष तप करने पर जितने कर्मो का नाश होता था आज हीन सहनन में एक वर्ष के तप द्वारा कर्मो का नाश होता है।"       इसका कारण यह है कि हीन

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महराज के परिवार में उच्च संस्कार - अमृत माँ जिनवाणी - १९

?    अमृत माँ जिनवाणी से - १९    ?     "महाराज के परिवार मे उच्च संस्कार"        वर्ष १९५२ मे चरित्र चक्रवर्ती ग्रंथ के लेखक आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज के ग्राम मे उनके गृहस्त जीवन के बारे मे जानकारी प्राप्त करने हेतु गए।       ११ सितम्बर को अष्टमी के  दिन उनको उस पवित्र घर मे भोजन मिला, जहाँ आचार्य महाराज रहा करते थे।       उस दिन पंडितजी के लिए लवण आदि षटरस विहीन भोजन बना था।वह भोजन करने बैठे।पास मे महाराज के भाई का नाती भोजन कर रहा था।       बालक भीम की थाली मे ब

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शुभ दोहला - अमृत माँ जिनवाणी से - १८

?    अमृत माँ जिनवाणी से - १८    ?                   "शुभ दोहला"        चरित्र चक्रवर्ती ग्रंथ के लेखक जब आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज के बचपन की स्मृतियों के बारे में जानने हेतु उनके गृहस्थ जीवन के बड़े भाई मुनि श्री वर्धमान सागर जी महाराज के पास गए।     उन्होंने पूंछा, "स्वामिन् संसार का उद्धार करने वाले महापुरुष जब माता पिता के गर्भ में आते हैं, तब शुभ- शगुन कुटुम्बियों आदि को देखते हैं। माता को भी मंगल स्वप्न आदि का दर्शन होता है।          आचार्य महाराज सदृश रत्नत्रय

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सर्पराज का शरीर पर लिपटना - अमृत माँ जिनवाणी से - १७

?    अमृत माँ जिनवाणी से - १७    ?         "सर्पराज का शरीर पर लिपटना"         आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज की तपस्चर्या अद्भुत थी। कोगनोली में लगभग आठ फुट लंबा स्थूलकाय सर्पराज उनके शरीर से दो घंटे पर्यन्त लिपटा रहा । वह सर्प भीषण होने के साथ ही वजनदार भी था । महाराज का शरीर अधिक बलशाली था, इससे वे उसके भारी भोज का धारण कर सके।              दो घंटे बाद में उनके पास पहुँचा । उस समय वे अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में थे । किसी प्रकार की खेद, चिंता या मलिनता उनके मुख मंडल पर नहीं

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असाधारण शक्ति - अमृत माँ जिनवाणी से - १६

?     अमृत माँ जिनवाणी से - १६     ?               "असाधारण शक्ति"              आचार्य शान्तिसागरजी महाराज का शरीर बाल्य-काल मे असाधारण शक्ति सम्पन्न रहा है। चावल के लगभग चार मन के बोरों को सहज ही वे उठा लेते थे। उनके समान कुश्ती खेलने वाला कोई नही था। उनका शरीर पत्थर की तरह कड़ा था।       वे बैल को अलग कर स्वयं उसके स्थान में लगकर, अपने हांथो से कुँए से मोट द्वारा पानी खेच लेते थे। वे दोनो पैर को जोड़कर १२ हाथ लंबी जगह को लांघ जाते थे। उनके अपार बल के कारण जनता उन्हें बहुत चाहती

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येलगुल में जन्म - अमृत माँ जिनवाणी से - १५

?       अमृत जिनवाणी से -१५       ?                 "येलगुल मे जन्म"          जैन संस्कृति के विकास तथा उन्नति के इतिहास पर दृष्टि डालने पर यह ज्ञात होता है कि विश्व को मोह अंधकार से दूर करने वाले तीर्थंकरो ने अपने जन्म द्वारा उत्तर भारत को पवित्र किया तथा निर्वाण द्वारा उसे ही तीर्थस्थल बनाया, किन्तु उनकी धर्ममयी देशना रूप अमृत को पीकर, वीतरागता के रस से भरे शास्त्रो का निर्माण करने वाले धुरंधर आचार्यो ने अपने जन्म से दक्षिण भारत की भूमि को श्रुत तीर्थ बनाया।       उसी ज्ञा

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लोतोत्तर वैराग्य - अमृत माँ जिनवाणी से - १४

?      अमृत माँ जिनवाणी से - १४     ?                 " लोकोत्तर वैराग्य "        आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज के ह्रदय मे अपूर्व वैराग्य था।       एक समय मुनि वर्धमान स्वामी ने महाराज के पास अपनी प्रार्थना भिजवायी- "महाराज ! मैं तो बानबे वर्ष से अधिक का हो गया। आपके दर्शनों की बड़ी इच्छा है। क्या करूँ ? "      इस पर महाराज ने कहा- "हमारा वर्धमान सागर का क्या संबंध ? ग्रहस्थावस्था मे हमारा बड़ा भाई रहा है सो इसमें क्या ? हम तो सब कुछ त्याग कर चुके हैं।        पंच प

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द्रोणगिरी क्षेत्र में शेर का आना - अमृत माँ जिनवाणी से - १३

?     अमृत माँ जिनवाणी से -१३     ?        "द्रोणागिरी क्षेत्र में सिंह का आना"           सन १९२८ मे वैसाख सुदी एकम को आचार्य शान्तिसागर महाराज का संघ द्रोणागिरी सिद्ध क्षेत्र पहुँचा।हजारो भाइयो ने दूर-२ से आकर दर्शन का लाभ लिया।       महाराज पर्वत पर जाकर जिनालय मे ध्यान करते थे। उनका रात्रि का निवास पर्वत पर होता था। प्रभात होते ही लगभग आठ बजे महाराज पर्वत से उतरकर नीचे आ जाते थे।     एक दिन की बात है कि महाराज समय पर ना आये। सोचा गया संभवतः वे ध्यान मे मग्न होंगे। दर्

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बाहुबली स्वामी के बारे में अलौकिक दृष्टि - अमृत माँ जिनवाणी से - १२

?    अमृत माँ जिनवाणी से - १२    ? "बाहुबलीस्वामी के विषय मे आलौकिक दृष्टी"      जब हमने आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज से पुछा- "महाराज गोमटेश्वर की मूर्ति का आपने दर्शन किया है उस सम्बन्ध मे आपके अंतरंग मे उत्पन्न उज्ज्वल भावो को जानने की बड़ी इच्छा है।"     उस समय महाराज ने उत्तर दिया था उसे सुनकर हम चकित हो गये।               उन्होंने कहा था- "बाहुबली स्वामी की मूर्ति बड़ी है। यह जिनबिम्ब हमे अन्य मूर्तियो के समान ही लगी। हम तो जिनेन्द्र के गुणों का चिंतवन करते हैं, इसीलिए ब

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आत्मबल - अमृत माँ जिनवाणी से - ११

?    अमृत माँ जिनवाणी से - ११     ?                     "आत्मबल"                 आत्मबल जागृत होने पर बड़े-२ उपवास आदि तप सरल दिखते हैं।      बारहवे उपवास के दिन लगभग आधा मील चलकर मंदिर से आते हुए आचार्य शान्तिसागर महाराज के शिष्य पूज्य नेमिसागर मुनिराज ने कहा था- "पंडितजी ! आत्मा में अनंत शक्ति है।अभी हम दस मील पैदल चल सकते हैं।"      मैंने कहा था- "महाराज, आज आपके बारह उपवास हो गए हैं।" वे बोले, "जो हो गए, उनको हम नहीं देखते हैं।इस समय हमें ऐंसा लगता है, कि अब केवल पाँ

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वैभवशाली दया के पात्र हैं - अमृत माँ जिनवाणी से - १०

?     अमृत माँ जिनवाणी से -१०     ?           "वैभवशाली दया पात्र हैं"      दीन और दुखी जीवो पर तो सबको दया आती है । सुखी प्राणी को देखकर किसके अंतःकरण में करुणा का भाव जागेगा ?        आचार्य शान्तिसागर महाराज की दिव्य दृष्टि में धनी और वैभव वाले भी उसी प्रकार करुणा व् दया के पात्र हैं, जिस प्रकार दीन, दुखी तथा विपत्तिग्रस्त दया के पात्र हैं। एक दिन महाराज कहने लगे, "हमको संपन्न और सुखी लोगों को देखकर बड़ी दया आती है।"       मैंने पुछा, "महाराज ! सुखी जीवो पर दया भाव का

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सामयिक बात - अमृत माँ जिनवाणी से - ९

?      अमृत माँ जिनवाणी से - ९      ?                    सामयिक बात      आचार्य शान्तिसागरजी महाराज सामयिक बात करने में अत्यंत प्रवीण थे।         एक दिन की बात है, शिरोड के बकील महाराज के पास आकर कहने लगे -  "महाराज, हमे आत्मा दिखती है।  अब और क्या करना चाहिए?"         कोई तार्किक होता, तो बकील साहब के आत्मदर्शन के विषय में विविध प्रश्नो के द्वारा उनके कृत्रिम आत्मबोध की कलई खोलकर उनका उपहास करने का उद्योग करता, किन्तु यहॉ संतराज आचार्य महाराज के मन में उन भले बकील

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उपवास से क्या लाभ है? - अमृत माँ जिनवाणी से - ८

?      अमृत माँ जिनवाणी से - ८      ?              "उपवास से क्या लाभ है?"                   उपवास से क्या लाभ होता है इस विषय में आचार्यश्री शान्तिसागर जी महाराज ने अपनी अनुभव-पूर्ण वाणी से कहा था - "मदोन्मत्त हाँथी को पकड़ने के लिए कुशल व्यक्ति उसे कृत्रिम हथिनी की ओर आकर्षित कर गहरे गड्ढे में फसाते हैं।      उसे बहुत समय तक भूखा रखते हैं।इससे उस हाँथी का उन्मत्तपना दूर हो जाता है और वह छोटे से अंकुश के इशारे पर प्रवृति करता है।      वह अपना स्वछन्द विचरना भूल जाता है।इ

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शहद भक्षण में क्या दोष है - अमृत माँ जिनवाणी से - ७

?    अमृत माँ जिनवाणी से - ७    ?        "शहद भक्षण में क्या दोष है"       एक दिन मैंने आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज से पूंछा, "महाराज, आजकल लोग मधु खाने की ओर उद्यत हो रहे हैं क्योंकि उनका कथन है, क़ि अहिंसात्मक पद्धति से जो तैयार होता है, उसमे दोष नहीं हैं।"    महाराज ने कहा, "आगम में मधु को अगणित त्रस जीवो का पिंड कहा है, अतः उसके सेवन में महान पाप है।    मैंने कहा, "महाराज सन् १९३४ को मै बर्धा आश्रम में गाँधी जी से मिला था।उस समय वे करीब पाव भर शहद खाया करते थे।मैं

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अपूर्व दयालुता - अमृत माँ जिनवाणी से - ६

?     अमृत माँ जिनवाणी से - ६     ?                "अपूर्व दयालुता"                         भोज ग्राम में गणु जयोति दमाले नामक एक मराठा किसान ८० वर्ष की अवस्था का था।वह एक ब्राम्हण के खेत में मजदूरी करता रहा था।उस बृद्ध मराठा को जब यह समाचार पहुँचा कि महाराज के जीवन के सम्बन्ध में परिचय पाने को कोई व्यक्ति बाहर से आया है, तो वह महाराज का भक्त मध्यान्ह में दो मील की दूरी से भूखा ही समाचार देने को हमारे पास आया| उस कृषक से इस प्रकार की महत्त्व की सामग्री ज्ञात हुई:            उसन

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शिखरजी की वंदना से त्याग और नियम - अमृत माँ जिनवाणी से - ५

?     अमृत माँ जिनवाणी से - ५      ?   "शिखरजी की वंदना से त्याग और नियम"      आचार्यश्री शान्तिसागर महाराज गृहस्थ जीवन में जब शिखरजी की वंदना को जब बत्तीस वर्ष की अवस्था में पहुंचे थे, तब उन्होंने नित्य निर्वाण भूमि की स्मृति में विशेष प्रतिज्ञा लेने का विचार किया और जीवन भर के लिए घी तथा तेल भक्षण का त्याग किया।घर आते ही इन भावी मुनिनाथ ने एक बार भोजन की प्रतिज्ञा ले ली।      रोगी व्यक्ति भी अपने शारीर रक्षण हेतु कड़ा संयम पालने में असमर्थ होता है किन्तु इन प्रचंड -बली सतपु

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वानरों पर प्रभाव - अमृत माँ जिनवाणी से - ४

?    अमृत माँ जिनवाणी से - ४    ?                 "वानरो पर प्रभाव"               शिखरजी की तीर्थवंदना से लौटते हुए महाराज का संघ सन् १९२८ में विंध्यप्रदेश में आया। विध्याटवी का भीषण वन चारों ओर था। एक ऐसी जगह पर संघ पहुँचा, जहाँ आहार बनाने का समय हो गया था। श्रावक लोग चिंतित थे कि इस जगह वानरों की सेना स्वछन्द शासन तथा संचार है, ऐसी जगह किस प्रकार भोजन तैयार होगा और किस प्रकार इन सधुराज की विधि सम्पन्न होगी? उस स्थान से आगे चौदह मील तक ठहरने योग्य जगह नही थी।              

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माता की धर्म परायणता - अमृत माँ जिनवाणी से - ३

?    अमृत माँ जिनवाणी से - ३    ?           "माता की धर्म परायणता"     आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज के जीवन में उनके माता-पिता की धार्मिकता का बड़ा प्रभाव था।         सन १९४८ के दशलक्षण पर्व में फलटण नगर में उन्होंने बताया था कि, "हमारी माता अत्यंत धार्मिक थी, "वह अष्टमी चतुर्दशी को उपवास करती तथा साधुओ को आहार देती थी।             हम भी बचपन से ही साधुओ को आहार देने में योग दिया करते थे, उनके कमण्डलु को हाथ में रखकर उनके साथ जाया करते थे। छोटी अवस्था से ही हमारे मन मे

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मिथ्या देवों की उपासना का निषेध - अमृत माँ जिनवाणी से - २

?     अमृत माँ जिनवाणी से - २     ?      "मिथ्या देवों की उपासना का निषेध"             "जैन मंत्र का अपूर्व प्रभाव"                           जैनवाणी नामक ग्राम में महाराज जैनियो को मिथ्यादेवों की पूजा के त्याग करा रहे थे, तब ग्राम के मुख्य जैनियो ने पूज्यश्री से प्रार्थना की, "महाराज ! आपकी सेवा में एक नम्र विनती है।"महाराज ने बड़े प्रेम से पूछा -  "क्या कहना है कहो?"               जैन बन्धु बोले -  "महाराज ! इस ग्राम में सर्प का बहुत उपद्रव है। सर्प का विष उतारने में निपुण

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☀स्थिर मन - अमृत माँ जिनवाणी से - १

?     अमृत माँ जिनवाणी से - १     ?                      "स्थिर मन"                   एक बार लेखक ने आचार्यश्री शान्तिसागरजी महाराज से पूछा, महाराज आप निरंतर स्वाध्याय आदि कार्य करते रहते है क्या इसका लक्ष्य मन रूपी बन्दर को बाँधकर रखना है जिससे वह चंचलता ना दिखाये।महाराज बोले, "हमारा बन्दर चंचल नहीं है"|            लेखक ने कहा,  "महाराज मन की स्थिरता कैसे हो सकती है,वह तो चंचलता उत्पन्न करता ही है"          महाराज ने कहा, "हमारे पास चंचलता के कारण नहीं रहे है|जिसके पास

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