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कर्मचक्र - ४८

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           पूज्य वर्णीजी के जीवन में कितनी विषय परिस्थियाँ थी यह आज की प्रस्तुती ज्ञात होगा।        ज्वर जो एक दिन छोड़कर आता था वह दो दिन छोड़कर आने लगा। चार कम्बल ओढ़ने से भी ज्वर में ठंड शांत न होती जबकि एक कम्बल भी नहीं। शरीर में पकनू खाज हो गई। प्रतिदिन २० मील चलते थे और भोजन था ज्वार के आटे की रोटी नमक के साथ।     मार्ग में घोर जंगल में भोजन को रुके, बुखार आने से बेहोश हो गए। ऐसी-२ कठिन परिस्थितियों में भी पूज्य वर्णीजी वंदना के मार्ग में आगे बढ़ते रहे

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कर्मचक्र - ४७

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           अजैन कुल से आकर जैनधर्म के सिद्धांतों का प्रचारित करने का श्रेय रखने वाले पूज्य वर्णीजी के प्रारंभिक जीवन में बहुत ही विषम परिस्थितियाँ थी।        आजकी प्रस्तुती को पढ़कर, पूज्य वर्णीजी के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर एक पाठक की आँख भीगे बिना नहीं रहेगी।         कितनी दयनीय स्थिति थी उस समय उनकी, पैसे के लिए मजदूरी करने का प्रयास किया, अशक्य होने से अपनी परिस्थिति में रोते रहे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                    

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कर्मचक्र - ४६

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           इस अंश का शीर्षक है कर्मचक्र। बिल्कुल सही शीर्षक है। जैनधर्म की महती प्रभावना करने वाले महापुरुष के जीवन में प्रारंभिक समय में कर्मों की स्थिति देखिए। कितनी दयनीय स्थिति।       कपढ़े विवर्ण हो गए, शरीर में खाज हो गया, एक दिन छोड़कर ज्वर आने लगा। कोई सहायता को नहीं, कोई पूंछने वाला नहीं। कोई सुनने वाला नहीं।       जिनधर्म में विशेष श्रद्धावान गणेश प्रसाद का वह प्रारंभिक समय बड़ा ही विषम था। वह गिरिनार जी की वंदना के लोभ स्वरूप जुएँ में पैसे भी लगा

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मुक्तागिरी - ४५

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           आज के प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी की मुक्तागिरि वंदना का वृत्तांत है।       अगली प्रस्तुती का शीर्षक है "कर्म चक्र"। जिनमार्ग में विशेष प्रीति रखने वाले पूज्य वर्णीजी की हालत उस समय अत्यंत ही दयनीय हो गई थी। आत्मकथा के उन प्रसंगों को जानकर हम पुण्य पुरुष पूज्य वर्णीजी के असाधारण व्यक्तित्व से परिचत होंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"मुक्तागिरि"*                      *क्रमांक - ४५*          

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रामटेक - ४४

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           यहाँ पूज्य वर्णीजी ने मिथ्याप्रचार के कारण को स्पष्ट किया है साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जीव को कल्याणकारी आगमा का अभ्यास करना बहुत आवश्यक है।      कल से वर्णीजी की मुक्तागिरी वंदना हेतु यात्रा का उल्लेख होगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४४*                 संसार में जो मिथ्या प्रचार फैल रहा है उसमें मूल कारण रागद्वेष की मलिनता से जो कुछ लिखा गया वह साहि

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रामटेक - ४३

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,             कल की प्रस्तुती के अंश में वर्णीजी द्वारा वर्णित निश्चय की दृष्टि से प्रभावना को देखा। उन्होंने वर्णन किया कि आत्मीय श्रद्धान, ज्ञान- चारित्र द्वारा निर्मल बनाने का प्रयत्न जिससे अन्य धर्माबलंबियों के ह्रदय में स्वयं समा जाये कि धर्म यह वस्तु है। निश्चय प्रभावना है।      आज के अंशों में व्यवहार में प्रभावना को वर्णीजी ने स्पष्ट किया है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"रामटेक"*                      *क्

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रामटेक - ४२

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,      पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४२*              हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की ब

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रामटेक - ४१

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,         अनेक पाठकों ने श्री रामटेक जी की वंदना की होगी। आत्मकथा की आज की प्रस्तुती के अंशों से हम पूज्य वर्णीजी की अनुभूति के अनुसार श्री रामटेक जी की वंदना करेंगे।      पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"रामटेक"*                

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रामटेक - ४०

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                       *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४०*               श्री कुण्डलपुर से यात्रा करने के पश्चात श्री रामटेक के वास्ते प्रयाण किया। हिंडोरिया आया। यहाँ तालाब पर प्राचीन काल का एक जिनबिम्ब है। यहाँ पर कोई जैनी नहीं। यहाँ से चलकर दमोह आया, यहाँ २०० घर जैनियों के बड़े-बड़े धनाढ्य हैं।       मंदिरों की रचना अति सुदृढ़ और सुंदर है। मूर्ति समुदाय पुष्कल है। अनेक मंदिर है। मेरा किसी से परिचय न था और न करने का प्रयास भी कि

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३९

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,       अद्भुत भावाभिव्यक्ति पूज्य वर्णीजी की श्री वीर प्रभु के चरणों में।       मैं पूर्ण विश्वास के साथ कर सकता हूँ स्वाध्याय की रुचि रखने वाला हर एक श्रावक जो प्रस्तुत भावों को ध्यानपूर्वक पढ़ता है वह अद्भुत अभिव्यक्ति कहे बिना रहेगा ही नहीं।        आत्मकथा प्रस्तुती का यह प्रारंभिक चरण ही है इतने में ही हम पूज्य वर्णीजी के भावों की गहराई से उनका परिचय पाने लगे हैं।       उनकी आत्मकथा ऐसे ही तत्वपरक उत्कृष्ट भावों से भरी पढ़ी है। निश्चित ही वर्णीजी की

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३८

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*          

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३७

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज की प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी के प्रारंभिक समय में श्री कुण्डलपुर सिद्ध क्षेत्र में वंदना के समय भावों का उल्लेख है।       एक भव्यात्मा के विशुद्ध भाव अवश्य ही हम सभी के जीवन को भी कल्याण की दिशा बतलाने वाले हैं यदि आप इनको गंभीरता पूर्वक पढ़ते हैं।        पूज्य वर्णीजी ने यहा भली प्रकार स्पष्ट किया है कि भगवान वीतरागी हैं वह किसी को कुछ नहीं देते। वीरप्रभु के श्री चरणों में उनकी विनती जिनेन्द्र भगवान के दर्शन का महत्व भी स्पष्ट करती है।    

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३६

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,        रुचिवान पाठक यह विचार कर रहे होंगे कि गणेश प्रसाद ने नैनागिरि से श्री कुण्डलपुर जाते समय रास्ते में जहाँ रात्रि विश्राम किया था वहाँ लोगों के भोजन के आग्रह के निवेदन में क्या किया। आज आप वह जानेगें।        श्री कुण्डलपुर जी की वंदना तो अधिकांश पाठकों ने की होगी। लेकिन वर्णी जी का वंदना संबंधी अनुभूति परक वर्णन का यह उल्लेख आपकी वंदना की स्मृति को ताजा करेगा ही साथ ही उस समय वर्णीजी द्वारा की गई आनन्दनुभीति का भी अनुभव करायेगा।           कभी कभी प्रस

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३५

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,        मैं जब पूज्य वर्णीजी की आत्मकथा को पढ़ता हूँ। ह्रदय भीग जाता है उनके जीवन को जानकर।         यदि आप भी पूज्य वर्णीजी के जीवन चरित्र को रुचि पढ़ रहे हैं तो आपका अंतःकरण भी एक महापुरुष के जीवन को नजदीक से स्पर्श करके अद्भुत आनंद के अनुभव से अछूता नहीं रहेगे।         आत्मकथा में आज के अंश से ज्ञात होता है कि भले ही उनके पास साधन नहीं थे लेकिन गणेश प्रसाद आत्मसाधना के लिए कितने व्याकुल थे।        रेशन्दीगिरि अर्थात सिद्ध क्षेत्र नैनागिरि वंदना के साथ

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३४

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,         आत्मकथा की आज की प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी द्वारा रेशन्दीगिरी सिद्ध क्षेत्र की वंदना के समय अपनी अनुभूति का वर्णन है।         रुचिवान पाठक अवश्य ही वर्णीजी की अनुभूति के वर्णन को पढ़कर अपने अंदर भी आनंदानुभूति कर रहे होंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?           *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*                      *क्रमांक - ३४*            पूज्य वर्णी जी अपनी आत्मकथा में रेशन्दीगिरी तीर्थ की वंदना के समय अपने अनुभूति को

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३३

☀ जय जिनेन्द्र बंधुओं,           जिनधर्म में अनुरक्त अंतःकरण वाले गणेश प्रसाद अपनी माँ व पत्नी के पास वापिस तो आ गए लेकिन उनका मन धर्म-ध्यान की क्रियाओं की ओर ही आकर्षित था।         पिछले प्रसंग से स्पष्ट होता है कि पूज्य वर्णी जी की स्थिति बहुत दीनता पूर्ण थी।      उनकी आत्मा का धर्म-ध्यान के प्रति आकर्षण ही उनकी तीर्थवंदना आदि को प्रेरित कर रहा था जबकि गणेश प्रसाद को स्वयं ही मालूम नहीं था कि तीर्थवंदना आदि क्रियाओं का उनका उद्देश्य क्या है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद व

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सेठ लक्ष्मीचंद जी - ३२

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"सेठ लक्ष्मीचंद जी"*                     क्रमांक - ३२                उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका शुभागमन कैसे हुआ?' मैंने कहा- 'क्या कहूँ? मेरी दशा अत्यंत करुणामयी है। उसका दिग्दर्शन कराने से आपके चित्त में खिन्नता ही बढ़ेगी।       प्राणियों ने जो अर्जन किया है उसका फल कौन भोगे? मेरी कथा सुनने की इच्छा छोड़ दीजिए। कुछ जैनधर्म का वर्णन कीजिए, जिससे शांति का लाभ हो।'         आपने एक घण्टा आत्मधर्म का समीचीन रीति से विवेचन कर मे

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सेठ लक्ष्मीचंद जी - ३१

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           गणेश प्रसाद ने जिनधर्म पर आस्था के आधार पर अपनी माँ तथा पत्नी के साथ रहना तभी उचित समझा था जब वह लोग भी अपना आचरण जिनधर्म के अनुसार रखें। उन्होंने अपनी माँ को इस हेतु पत्र भी लिखा था।          आज के प्रस्तुती में उनका अपनी माँ के पास आने का उल्लेख है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"सेठ लक्ष्मीचंद जी"*                     क्रमांक - ३१              मुझे आया हुआ देख माँ बड़ी प्रसन्न हुई। बोली- 'बेटा ! आ गये?' मैंने कहा

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खुरई में तीन दिन - ३०

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           आत्मकथा की आज की प्रस्तुती से ज्ञात होगा कि वर्णी जी ने विद्धवान के अनुचित कथन के प्रतिउत्तर में ज्ञानार्जन की प्रतिज्ञा अवश्य की लेकिन उनके पास ज्ञानार्जन हेतु कोई साधन नहीं था।         पूज्य वर्णीजी की आत्मकथा को जैसे जैसे हम पढ़ते जाएँगे वैसे वैसे ज्ञात होता रहेगा कि कैसी कठिन परिस्थितयों में आगे बढ़ते हुए उन्होंने ज्ञानार्जन किया और अन्य लोगों को भी ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"खुरई में

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खुरई में तीन दिन - २९

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज की प्रस्तुती का यह प्रसंग वर्णी जी के जीवन का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। कल की प्रस्तुती में हमने देखा विद्धवान ने गणेश प्रसाद से कहा कि अच्छे खान पान के लोभ में लोग जैन धर्म को धारण करते हैं।       वर्णी जी ने उन विद्धवान की अनुचित बातों के उत्तर में जो कहा उससे उनके अंदर, विद्धवान के कथन के कारण उत्पन्न हुई अंतर्वेदना स्पष्ट होती है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - २९

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खुरई में तीन दिन - २८

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,        जैनधर्म की महान प्रभावना करने वाले पूज्य वर्णी जी से उनके प्रारंभिक समय में जब वह अपनी ज्ञान लिप्सा के आधार पर आत्मकल्याण हेतु जैनधर्म के मर्म को जानने हेतु पुरुषार्थ शील थे,       विद्धवान ने गणेश प्रसाद से कहा- *मनुष्य जैनधर्म को कुछ समझते तो है नहीं, केवल खानपान के लोभ में जैन बन जाते हैं।*      आत्मकथा का यह प्रसंग वर्णी को जिनागम के ज्ञान प्राप्ति हेतु उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण बिंदु था।     विद्धवान के इस तरह के व्यवहार से ही वर्णी जी संकल्

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खुरई में तीन दिन - २७

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           अजैन कुल में जन्म होने बाद भी जिनधर्म से ही अपना कल्याण हो सकता है यह भावना रखकर आगे बढ़ने वाले गणेश प्रसाद का वर्णन उनकी ही आत्मकथा के अनुसार चल रहा है।          आज की प्रस्तुती में उनका खुरई जाने तथा वहाँ के जिनालय में जिनबिम्बों  का वर्णीजी द्वारा किए गए गुणावाद का आनंदप्रद वर्णन है।        ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - २७              तीन या चार दिन में मैं खुर

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सुरुपचन्द बनपुरिया और खुरई यात्रा - २६

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,            अपना कल्याण जिनधर्म से ही संभव है ऐसा अंतरंग श्रद्धान रखने वाले श्री गणेश प्रसाद,  जिनधर्म के मर्म को जानने की प्रवल इच्छा अपने अंदर रखकर, उसे पाने के लिए उनके सतत प्रयत्न का अवलोकन आत्मकथा के इन अंशो से होता है।        यहाँ जैनधर्म के अच्छे विद्धवान श्री निशोर वैद्य के  गणेश प्रसाद को महत्वपूर्ण उदभोदन का भी उल्लेख है।  ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"सुरुपचंद्रजी बनपुरिया और खुरई यात्रा"*                     क्रमांक - २६    

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