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कर्मचक्र - ४८


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          पूज्य वर्णीजी के जीवन में कितनी विषय परिस्थियाँ थी यह आज की प्रस्तुती ज्ञात होगा।        ज्वर जो एक दिन छोड़कर आता था वह दो दिन छोड़कर आने लगा। चार कम्बल ओढ़ने से भी ज्वर में ठंड शांत न होती जबकि एक कम्बल भी नहीं। शरीर में पकनू खाज हो गई। प्रतिदिन २० मील चलते थे और भोजन था ज्वार के आटे की रोटी नमक के साथ।     मार्ग में घोर जंगल में भोजन को रुके, बुखार आने से बेहोश हो गए। ऐसी-२ कठिन परिस्थितियों में भी पूज्य वर्णीजी वंदना के मार्ग में आगे बढ़ते रहे।        ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४८*                   उस समय अपने भाग्य का गुणगान करते हुआ आगे बढ़ा। कुछ दिन बाद ऐसे स्थान पर पहुँचा, जहाँ पर जिनालय था। जिनालय में श्री जिनेन्द्र देव के दर्शन किये। तत्पश्चात यहाँ से गजपन्था के लिए प्रस्थान कर दिया और गजपंथा पहुँच भी गया।         मार्ग में कैसे कैसे कष्ट उठाये उनका इसी से अनुमान कर लो कि जो ज्वर एक दिन बाद आता था वह अब दो दिन बाद आने लगा। इसको हमारे देश में तिजारी कहते हैं। इसमें इतनी ठंड लगती है कि चार सोड़रों से भी नहीं जाती। पर पास में एक भी नहीं थी।        साथ में पकनूँ खाज हो गई, शरीर कृश हो गया। इतना होने पर भी प्रतिदिन २० मील चलना और खाने को दो पैसे का आटा। वह भी जवारी का और कभी बाजरे का और वह भी बिना दाल शाक का। केवल नमक की कंकरी शाक थी।        घी क्या कहलाता है? कौन जाने, उसके दो मास से दर्शन भी न हुए थे। दो मास से दाल का भी दर्शन न हुआ था। किसी दिन रूखी रोटी बनाकर रक्खी और खाने की चेष्टा की कि तिजारी महरानी ने दर्शन देकर कहा- 'सो जाओ, अनधिकार चेष्टा न करो, अभी तुम्हारे पाप कर्म का उदय है, समता से सहन करो।'        पाप के उदय की पराकाष्ठा का उदय यदि देखा तो मैंने देखा। एक दिन की बात है- सधन जंगल में, जहाँ पर मनुष्यों का संचार न था, एक छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया। वहीं बाजरे के चूनकी लिट्टी लगाई, खाकर सो गया। निद्रा भंग हुई, चलने को उद्यमी हुआ, इतने मे भयंकर ज्वर आ गया।           बेहोश पड़ गया। रात्रि के नौ बजे होश आया। भयानक वन में था। सुध-बुध भूल गया। रात्रि भर भयभीत अवस्था में रहा। किसी तरह प्रातःकाल हुआ। श्री भगवान का स्मरण कर मार्ग में अनेक कष्टों की अनुभूति करता हुआ, श्री गजपंथाजी में पहुँच गया और आनंद से धर्मशाला में ठहरा। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १२?

Abhishek Jain

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कर्मचक्र - ४७


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          अजैन कुल से आकर जैनधर्म के सिद्धांतों का प्रचारित करने का श्रेय रखने वाले पूज्य वर्णीजी के प्रारंभिक जीवन में बहुत ही विषम परिस्थितियाँ थी।        आजकी प्रस्तुती को पढ़कर, पूज्य वर्णीजी के प्रति श्रद्धा रखने वाले हर एक पाठक की आँख भीगे बिना नहीं रहेगी।         कितनी दयनीय स्थिति थी उस समय उनकी, पैसे के लिए मजदूरी करने का प्रयास किया, अशक्य होने से अपनी परिस्थिति में रोते रहे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४७*       अब बचे दो रुपया सो विचार किया कि अब गलती न करो, अन्यथा आपत्ति में फस जाओगे। मन संतोष कर वहाँ से चल दिए। किसी तरह कष्टों को सहते हुए बैतूल पहुँचे।        उन दिनों अन्न सस्ता था। दो पैसे में S।। जवारी का आटा मिल जाता था। उसकी रोटी खाते हुए मार्ग तय करते थे। जब बैतूल पहुँचे, तब ग्राम के बाहर सड़क पर कुली लोग काम कर रहे थे।        हमने विचार किया कि यदि हम भी इस तरह काम करें तो हमें भी कुछ मिल जाया करेगा। मेट से कहा- 'भाई ! हमको भी लगा लो।' दयालु था, उसने हमको एक गैती दे दी और कहा कि 'मिट्टी खोदकर इन औरतों की टोकनी में भरते जाओ। तीन आने शाम को मिल जावेंगे।'        मैंने मिट्टी खोदना आरम्भ किया और एक टोकनी किसी तरह से भर कर उठा दी, दूसरी टोकनी नहीं भर सका। अंत में गेंती को वही पटक कर रोता हुआ आगे चल दिया।          मेंट ने दया कर बुलाया- 'रोते क्यों हो? मिट्टी को ढोओ, दो आना मिल जावेंगे।' गरज वह भी न बन पड़ा, तब मेट ने कहा- 'आपकी इच्छा सो करो।'         मैंने कहा- 'जनाब, बन्दगी, जाता हूँ।' उसने कहा- 'जाइये, यहाँ तो हट्टे-कट्टे पुरुषों का काम है।'
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण १०?

Abhishek Jain

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कर्मचक्र - ४६


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          इस अंश का शीर्षक है कर्मचक्र। बिल्कुल सही शीर्षक है। जैनधर्म की महती प्रभावना करने वाले महापुरुष के जीवन में प्रारंभिक समय में कर्मों की स्थिति देखिए। कितनी दयनीय स्थिति।       कपढ़े विवर्ण हो गए, शरीर में खाज हो गया, एक दिन छोड़कर ज्वर आने लगा। कोई सहायता को नहीं, कोई पूंछने वाला नहीं। कोई सुनने वाला नहीं।       जिनधर्म में विशेष श्रद्धावान गणेश प्रसाद का वह प्रारंभिक समय बड़ा ही विषम था। वह गिरिनार जी की वंदना के लोभ स्वरूप जुएँ में पैसे भी लगा कर हार गए।        बड़ा ही रोचक है वर्णीजी की गणेशप्रसाद से वर्णी बनने तक की यात्रा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"कर्मचक्र"*                      *क्रमांक - ४८*
                पास में पचास रुपये मात्र रह गये। कपड़े विवर्ण हो गये। शरीर में खाज हो गई। एक दिन बाद ज्वर आने लगा। सहायी कोई नहीं। केवल दैव ही सहायी था। क्या करूँ?       कुछ समझ नहीं आता था - कर्तव्य विमूढ़ हो गया। कहाँ जाऊँ? यह भी निश्चय नहीं कर सका। किससे अपनी व्यथा कहूँ? यह भी समझ नहीं आया। कहता भी तो सुनने वाला कौन था? खिन्न होकर पड़ गया।        रात्रि को स्वप्न आया- 'दुख करने से क्या लाभ?' कोई कहता है- 'गिरिनार को चले जाओ।' 'कैसे जावें?' साधन तो कुछ है नहीं' मैंने कहा। वही उत्तर मिला- 'नरकी जीवों की अपेक्षा अच्छे हो।'         प्रातःकाल हुआ। श्री सिद्धक्षेत्र वंदना कर बैतूल नगर के लिए चल दिया। तीन कोश चलकर एक हाट मिली। वहाँ एक स्थान पर पत्ते का जुआ ही रहा था। १) के ५) मिलते थे।         हमने विचार किया- 'चलो ५) लगा दो २५) मिल जावेंगे, फिर आनंद से रेल में बैठकर श्री गिरिनार की यात्रा सहज में हो जावेगी। इत्यादि।' १) में ५) मिलेगा इस लोभ से ३) लगा दिए। पत्ता हमारा नहीं आया। ३) चले गए।        अब बचे दो रुपया सो विचार किया कि अब गलती न करो, अन्यथा आपत्ति में फस जाओगे। मन संतोष कर वहाँ से चल दिए। किसी तरह कष्टों को सहते हुए बैतूल पहुँचे। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- आषाढ़ कृष्ण ८?

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मुक्तागिरी - ४५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          आज के प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी की मुक्तागिरि वंदना का वृत्तांत है।       अगली प्रस्तुती का शीर्षक है "कर्म चक्र"। जिनमार्ग में विशेष प्रीति रखने वाले पूज्य वर्णीजी की हालत उस समय अत्यंत ही दयनीय हो गई थी। आत्मकथा के उन प्रसंगों को जानकर हम पुण्य पुरुष पूज्य वर्णीजी के असाधारण व्यक्तित्व से परिचत होंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"मुक्तागिरि"*                      *क्रमांक - ४५*
                चार दिन बाद रामटेक से चल दिया, बाद में कामठी के जैन मंदिरों के दर्शन करता हुआ नागपुर पहुँचा। यहाँ पर अनेक मंदिर हैं। उनमें कितने ही बुंदेलखंड से आए हुए परवारों के हैं।         ये सब तेरहपंथी आम्नाय वाले हैं। मंदिरों के पास एक धर्मशाला है। अनेक जिनालय दक्षिण वालों के भी हैं जो बीस पंथी आम्नाय वाले हैं।        वहाँ पर रामभाउ पांडे एक योग्य पुरुष थे। आप बीस पंथी आम्नाय के भट्टारक के चेले थे। परंतु आपका प्रेम तत्व चर्चा में था, अतः चाहे तेरहपंथी आम्नाय का विद्वान हो, चाहे बीसपंथी आम्नाय का समान भाव से आप उन विद्वानों का आदर करते हैं।         वहाँ दो या तीन दिन रहकर मैंने अमरावती को प्रस्थान किया। बीच में बर्धा मिला। यहाँ भी जिनमंदिरों के समुदाय हैं, उनके दर्शन किए।        कई दिवसों के बाद अमरावती पहुँचा। वहाँ पर भी बुंदेलखंड से आये हुए परवारों के अनेक घर हैं जोकि तेरहपंथ आम्नाय को मानने वाले हैं। मंदिरों के पास एक धर्मशाला है। यहाँ पर श्री सिंघई पन्नालाल जी रहते थे। उनके यहाँ नियम था कि जो यात्री बाहर से आते थे उन सबको भोजन कराए बिना नहीं जाने देते थे।        यहाँ से श्री सिद्ध क्षेत्र मुक्तागिरि उत्सुकतापूर्वक चल पड़ा। बीच में एलचपुर मिला। यहाँ जिनमंदिरों के दर्शन कर दूसरे दिन मुक्तागिरि पहुँच गया।            मुक्तागिरि क्षेत्र की शोभा अवर्णनीय है। सर्वतः वनों से वेष्टित पर्वत है। पर्वत के ऊपर अनेक जिनालय हैं। नीचे कई मंदिर और धर्मशालाएँ हैं।              यह तपोभूमि है परंतु अब तो वहाँ न कोई त्यागी है न साधु। जो अन्य क्षेत्रों की व्यवस्था है वही अवस्था यहाँ की है। सानंद वंदना की। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ६?

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रामटेक - ४४


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
          यहाँ पूज्य वर्णीजी ने मिथ्याप्रचार के कारण को स्पष्ट किया है साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि जीव को कल्याणकारी आगमा का अभ्यास करना बहुत आवश्यक है।      कल से वर्णीजी की मुक्तागिरी वंदना हेतु यात्रा का उल्लेख होगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४४*                 संसार में जो मिथ्या प्रचार फैल रहा है उसमें मूल कारण रागद्वेष की मलिनता से जो कुछ लिखा गया वह साहित्य है। वही पुस्तकें कालान्तर में धर्मशास्त्र के रूप में मानी जाने लगीं।       लोग तो अनादिकाल से मिथ्यात्व के उदय में शरीर को आत्मा मानते हैं। जिनको अपना ही बोध नहीं वे पर को क्या जानें? जब अपना पराया ज्ञान नहीं तो कैसे सम्यकदृष्टि? यही श्री समयसार में लिखा है- 'परमाणुमित्तयं पि हु रागादीणं दु विज्जदे जस्स।
ण वि सो जाणदि अप्पाणयं दु सव्वागमधरो वि।।'       जो सर्वांग को जानने वाला हैं तो वह आत्मा को नहीं जानता है, जो आत्मा को नहीं जानता है वह जीव और अजीव को नहीं जानता वह सम्यकदृष्टि कैसे हो सकता है?        कहने का तात्पर्य यह कि आगमाभासका अभ्यास जीवादि को जानने में मुख्य कारण है और आगमाभास का अभ्यास जीवादिको अन्यथा जानने में कारण है। जिनको आत्मकल्याण कि लालसा है वे आप्तकथित आगम का अभ्यास करें। विशेष कहाँ तक लिखें?        क्षेत्रों पर ज्ञान के साधन कुछ नहीं, केवल रुपये इकठ्ठे करने के साधन हैं। कल्पना करो, यह धन यदि एकत्रित होता रहे और व्यय न हो तो अंत में नहीं के तुल्य हुआ। अस्तु, इस कथा से क्या लाभ? यहाँ चार दिन रहा। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ५?

Abhishek Jain

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रामटेक - ४३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
            कल की प्रस्तुती के अंश में वर्णीजी द्वारा वर्णित निश्चय की दृष्टि से प्रभावना को देखा। उन्होंने वर्णन किया कि आत्मीय श्रद्धान, ज्ञान- चारित्र द्वारा निर्मल बनाने का प्रयत्न जिससे अन्य धर्माबलंबियों के ह्रदय में स्वयं समा जाये कि धर्म यह वस्तु है। निश्चय प्रभावना है।      आज के अंशों में व्यवहार में प्रभावना को वर्णीजी ने स्पष्ट किया है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४३*              ऐसा दान करो, जिससे साधारण लोगों का भी उपकार हो। ऐसा विद्यालय खोलो, जिनसे यथाशक्ति सबको लाभ हो। ऐसे औषधालय खोलो, जिसमें शुद्ध औषधों का भंडार हो। ऐसे भोजनालय खोलो, जिनसे शुद्ध भोजन का प्रबंध हो।         अनाथों को भोजन दो। अनुकम्पा से प्राणीमात्र को दान का निषेध नहीं। अभयदानादि देकर प्राणियों को निर्भय बना दो। ऐसा तप करो, जिसे देखकर कट्टर से कट्टर विरोधियों की श्रद्धा हो जावे।        श्री जिनेन्द्रदेव की ऐसी ठाठबाट से पूजा करो, जो नास्तिकों के चित्त में भी आस्तिक्य भावों का संचार करें। इसका नाम व्यवहार में प्रभावना है। श्री समंतभद्रस्वामी ने भी कहा है कि- 'अज्ञानतिमिरव्याप्तिमपाकृत्य यथायथम्।
जिनशासन महात्म्यप्रकाशः स्यत्प्रभावना।।'       अज्ञानरूपी अंधकार की व्याप्ति से जगत आच्छन्न है, उसे यथाशक्ति दूरकर जिनशासन के माहात्म्य का प्रकाश करना, इसी का नाम सच्ची प्रभावना है।           संसार में अनादिकाल से मोह के वशीभूत होकर प्राणियों ने नाना प्रकार के धर्मों का प्रचार कर रखा है। कहाँ तक इसका वर्णन किया जाए? जीववध करके भी लोग उसे धर्म मानने लगे। जिसे अच्छे लोग पुष्ट करते हैं प्रमाण देते हैं कि शास्त्रों में लिखा है। उसे यहाँ लिखकर मैं आप लोगों का समय नहीं लेना चाहता। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ४?

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रामटेक - ४२


जय जिनेन्द्र बंधुओं,
     पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४२*              हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की बलवत्ता है जो हम लोग बाह्य कार्यों में द्रव्य का व्ययकर ही करने को कृतार्थ मान  लेते हैं।               मंदिरों में चाँदी के किवाड़ों की जोड़ी, चाँदी की चौकी, चाँदी का रथ, सुवर्ण के चमर, चाँदी की पालकी आदि बनवाने में ही व्यय करना पुण्य समझते हैं।        जब इन चाँदी के सामान को अन्य लोग देखते हैं तब यही अनुमान करते हैं कि जैनी लोग बड़े धनाढ्य हैं, किन्तु यह नहीं समझते कि जिस धर्म का यह पालन करने वाले हैं उस धर्म का मर्म क्या है?          यदि उसको वह लोग समझ जावें तो अनायास ही जैनधर्म से प्रेम करने लगें। श्री अमृतचंदसूरि ने तो प्रभावना का यह लक्षण लिखा है कि- 'आत्मा प्रभावनीयो रत्नत्रयतेजसा सततमेव।
     दानतपोजिनपूजाविद्यातिशयैर्जिनधर्मः।।'    
          वास्तविक प्रभावना तो यह है कि अपनी परिणति जो अनादि काल से पर को आत्मीय मान कलुषित हो रही है तथा परमें निजत्व का अवबोध कर विपर्यय ज्ञानवाली हो रही है एवं परपदार्थों में रागद्वेष कर मिथ्या-चारित्रमयी हो रही है, उसे आत्मीय श्रद्धान ज्ञानचारित्र के द्वारा ऐसी निर्मल बनाने का प्रयत्न किया जाय, इससे इतर धर्मावलंबियों के ह्रदय में स्वयमेव समा जावे कि धर्म तो यह वस्तु है। इसी को निश्चय प्रभावना कहते हैं। 
         ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ३?

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रामटेक - ४१


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         अनेक पाठकों ने श्री रामटेक जी की वंदना की होगी। आत्मकथा की आज की प्रस्तुती के अंशों से हम पूज्य वर्णीजी की अनुभूति के अनुसार श्री रामटेक जी की वंदना करेंगे।      पूज्य वर्णीजी की दृष्टि धर्म के मूल पर हमेशा रही। अतः वर्णीजी ने सभी तीर्थ स्थानों में विद्वान द्वारा हमेशा धार्मिक सिद्धांतों की व्याख्या तथा नियमित शास्त्र प्रवचन को बहुत आवश्यक कार्य बताया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४१*
              रामटेक के मंदिरों की शोभा अवर्णनीय है। यहाँ पर श्री शांतिनाथ स्वामी के दर्शन कर बहुत आनंद हुआ। यह स्थान अति रमणीय है। ग्राम से क्षेत्र ३ फर्लांग होगा। निर्जन स्थान है।           यहाँ चारों तरफ  बस्ती नहीं। २ मील पर पर्वत है जहाँ श्री रामचंद्र जी महराज का मंदिर है। वहाँ पर मैं नहीं गया। जैन मंदिरों के पास जो धर्मशाला थी उसमें निवास कर लिया।         क्षेत्र पर पुजारी,माली, जमादार, मुनीम आदि कर्मचारी थे। मंदिर की स्वच्छता पर कर्मचारीगणों का पूर्ण ध्यान था। ये सब साधन यहाँ पर अच्छे हैं, कोष भी क्षेत्र का अच्छा है, धर्मशाला आदि का प्रबंध उत्तम है। परंतु जिससे यात्रियों को आत्मलाभ हो उसका साधन कुछ नहीं।        उस समय मेरे मन में जो आया उसे कुछ विस्तार के साथ आज इस प्रकार कह सकते हैं-        ऐसे क्षेत्र पर आवश्यकता एक विद्वान की थी, जो प्रतिदिन शास्त्र प्रवचन करता और लोगों को मौलिक जैन सिद्धांत का का अवबोध कराता। जो जनता वहाँ पर निवास करती है उसे वह बोध हो जाता कि जैनधर्म इसे कहते हैं।      हम लोग मेले के अवसर पर हजारों रुपया व्यय कर देते हैं, परंतु लोगों को यह पता नहीं चलता कि मेला करने का उद्देश्य क्या है? समय की बलवत्ता है जो हम लोग बाह्य कार्यों में द्रव्य का व्ययकर ही करने को कृतार्थ मान  लेते हैं।   
        
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
     ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल १?

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रामटेक - ४०

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
                      *"रामटेक"*                      *क्रमांक - ४०*               श्री कुण्डलपुर से यात्रा करने के पश्चात श्री रामटेक के वास्ते प्रयाण किया। हिंडोरिया आया। यहाँ तालाब पर प्राचीन काल का एक जिनबिम्ब है। यहाँ पर कोई जैनी नहीं। यहाँ से चलकर दमोह आया, यहाँ २०० घर जैनियों के बड़े-बड़े धनाढ्य हैं।       मंदिरों की रचना अति सुदृढ़ और सुंदर है। मूर्ति समुदाय पुष्कल है। अनेक मंदिर है। मेरा किसी से परिचय न था और न करने का प्रयास भी किया, क्योंकि जैनधर्म का कुछ विशेष ज्ञान न था और न त्यागी ही था, जो किसी से कुछ कहता।         अतः दो दिन यहाँ निवास कर जबलपुर की सड़क द्वारा जबलपुर को प्रयाण कर दिया। मार्ग में अनेक जैन मंदिरों के दर्शन किए। चार दिन में जबलपुर पहुँच गया। वहाँ के मंदिरों की अवर्णनीय शोभा देखकर जो प्रमोद हुआ उसे कहने में असमर्थ हूँ।           यहाँ से रामटेक के लिए चल दिया। ६ दिन में सिवनी पहुँचा। यहाँ भी मंदिरों के दर्शन किए। दर्शन करने से मार्ग का श्रम एकदम चला गया। २ दिन बाद श्री रामटेक के लिए चल दिया। कई दिनों के बाद रामटेक क्षेत्रपर पहुँच गया।         
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल पूर्णिमा?

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३९


जय जिनेन्द्र बंधुओं,       अद्भुत भावाभिव्यक्ति पूज्य वर्णीजी की श्री वीर प्रभु के चरणों में।       मैं पूर्ण विश्वास के साथ कर सकता हूँ स्वाध्याय की रुचि रखने वाला हर एक श्रावक जो प्रस्तुत भावों को ध्यानपूर्वक पढ़ता है वह अद्भुत अभिव्यक्ति कहे बिना रहेगा ही नहीं।        आत्मकथा प्रस्तुती का यह प्रारंभिक चरण ही है इतने में ही हम पूज्य वर्णीजी के भावों की गहराई से उनका परिचय पाने लगे हैं।       उनकी आत्मकथा ऐसे ही तत्वपरक उत्कृष्ट भावों से भरी पढ़ी है। निश्चित ही वर्णीजी की आत्मकथा एक मानव कल्याणकारी ग्रंथ है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३९*         'जिस प्रकार कि भोक्तापन आत्मा का स्वभाव नहीं है। अज्ञान से ही यह आत्मा कर्ता बनता है। अतः अज्ञान के अभाव में अकर्ता ही है।'         अज्ञानी जीव भक्ति को ही सर्वस्य मान तल्लीन हो जाते हैं, क्योंकि उससे आगे उन्हें कुछ सूझता ही नहीं। परंतु जब ज्ञानी जीव जब श्रेणी चढ़ने को समर्थ नहीं होता तब अन्यत्र- जो मोक्षमार्ग के पात्र नहीं उनमें, राग न हो इस भाव से तथा तीव्र रागज्वर के अपगमकी भावना से श्री अरिहंत देव की भक्ति करता है। श्री अरिहंत देव के गुणों में अनुराग होना यही तो भक्ति है।        अरिहंत के गुण हैं- वीतरागता, सर्वज्ञता तथा मोक्षमार्ग का नेतापना। उनमें अनुराग होने से कौन सा विषय पुष्ट हुआ? यदि इन गुणों में प्रेम हुआ तो उन्हीं की प्राप्ति के अर्थ तो प्रयास है।        सम्यकदर्शन होने के बाद चारित्र मोह का चाहे तीव्र उदय हो चाहे मंद उदय हो, उसकी जो प्रवृत्ति होती है उसमें कर्तव्य बुद्धि नहीं रहती। अतएव श्री दौलतरामजी ने एक भजन में लिखा है कि-       'जे भव-हेतु अबुधिके तस करत बन्ध की छटा छटी'      अभिप्राय के बिना जो क्रिया होती है वह बंध की जनक नहीं। यदि अभिप्राय के अभाव में भी क्रिया बन्धजनक होने लगे तब यथख्यातचारित्र होकर भी अबन्ध नहीं हो सकता, अतः यह सिद्ध हुआ कि कषाय के सद्भाव में ही क्रिया बन्ध की उत्पादक है।        इसलिए प्रथम तो हमें अनात्मीय पदार्थों में जो आत्मीयता का अभिप्राय है और जिसके सद्भाव में हमारा ज्ञान तथा चारित्र मिथ्या हो रहा है उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए। तब विपरीत अभिप्राय के अभाव में आत्मा की जो अवस्था होती है वह रोग जाने के बाद रोगी के जो हल्कापन आता है तत्सदृश हो जाती है।        अथवा भारपगमन के बाद जो दशा भारवाहीकी होती है वही मिथ्या अभिप्राय के जाने के बाद आत्मा की हो जाती है और उस समय उसके अनुमापक प्रशम, संवेग, अनुकम्पा आदि गुणों का विकास आत्मा में स्वयमेव हो जाता है।         
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१४?

Abhishek Jain

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३८


जय जिनेन्द्र बंधुओं,       पूज्य वर्णीजी की श्री कुण्डलपुरजी की वंदना के समय वीर प्रभु के सम्मुख प्रार्थना के उल्लेख की प्रस्तुती चल रहीं है।      आप देखेंगे कि वर्णीजी की प्रस्तुत प्रार्थना में कितने सरल तरीके से जिनेन्द्र प्रभु के दर्शन का विज्ञान प्रस्तुत हो रहा है। वर्णीजी के भावों व तत्व चिंतन को पढ़कर आपको लगेगा जैसे आपके अतःकरण की बहुत सारी जटिलताएँ समाप्त होती जा रही हैं। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३८*
               श्री भगवान उपेक्षक हैं, क्योंकि उनके राग द्वेष नहीं है। जब यह बात है तब विचारो, जिनके राग द्वेष नहीं उनकी अपने भक्त की भलाई करने की बुद्धि नहीं हो सकती। वह देवेन्द्र ही क्या?        फिर प्रश्न हो सकता है कि उनकी भक्ति करने से क्या लाभ ? उनका उत्तर यह है कि जो मनुष्य छायादार वृक्ष के नीचे गया, उसको इस की आवश्यकता नहीं कि वृक्ष से याचना करे-हमें छाया दीजिए।        वह तो स्वयं ही वृक्ष के नीचे बैठने से छाया का लाभ ले रहा है। एवं जो रुचि पूर्वक भी अरिहंत देव के गुणों का स्मरण करता है उसके मंद कषाय होने से स्वयं शुभोपयोग होता है और उसके प्रभाव से स्वयं शांति का लाभ होने लगता है।        ऐसा निमित्त नैमत्तिक संबंध बन रहा है। परंतु व्यवहार ऐसा होता है जो वृक्ष की छाया। वास्तव में छाया तो वृक्ष की नहीं, सूर्य की किरणों का वृक्ष के द्वारा रोध होने से वृक्ष तल में स्वयमेव छाया हो जाती है। एवं श्री भगवान के गुणों का रुचि पूर्वक स्मरण करने से स्वयमेव जीवों के शुभ परिणामों की उत्पत्ति होती है, फिर भी व्यवहार में ऐसा कथन होता है कि भगवान ने शुभ परिणाम कर दिए।       भगवान को पतित पावन कहते हैं अर्थात जो पापियों का उद्धार करे वह पतित पावन है। यह कथन भी निमित्त कारण की अपेक्षा है। निमित्तकारणों में भी उदासीन निमित्त हैं प्रेरक नहीं, जैसे मछली गमन करे तो जल सहकारी कारण होता है। एवं जो जीव पतित है वह यदि शुभ परिणाम करे तो भगवान निमित्त हैं। यदि वह शुभ परिणाम न करे तो वह निमित्त नहीं।       वस्तु की मार्यादा यही है परंतु से कथन शैली नाना प्रकार की है। 'यथा कुल दीपकोयं बालकः, 'माणवकः सिंहः'। विशेष कहाँ तक लिखें? आत्मा की अचिन्त्य शक्ति है। वह मोहकर्म के निमित्त से विकास को प्राप्त नहीं होती।        मोहकर्म के उदय में यह जीव नाना प्रकार की कल्पनाएँ वर्तमान पर्याय की अपेक्षा तो सत है परंतु कर्मोदय के बिना उनका अस्तित्व नहीं, अतः असत हैं।
         
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१२? ☀
बंधुओं, महा मनीषी आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की दीक्षा के ५० वर्ष पूर्ण होने की बेला का पावन प्रकल्प. अपना अकाउंट बनाये वेबसाइट - vidyasagar.guru पर  जुड़े। ??
स्वर्ण सयंम माहोत्सव की समस्त गतिविधियों से.
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Abhishek Jain

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३७


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज की प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी के प्रारंभिक समय में श्री कुण्डलपुर सिद्ध क्षेत्र में वंदना के समय भावों का उल्लेख है।       एक भव्यात्मा के विशुद्ध भाव अवश्य ही हम सभी के जीवन को भी कल्याण की दिशा बतलाने वाले हैं यदि आप इनको गंभीरता पूर्वक पढ़ते हैं।        पूज्य वर्णीजी ने यहा भली प्रकार स्पष्ट किया है कि भगवान वीतरागी हैं वह किसी को कुछ नहीं देते। वीरप्रभु के श्री चरणों में उनकी विनती जिनेन्द्र भगवान के दर्शन का महत्व भी स्पष्ट करती है।        यदि आप रुचि रखते हैं तो वीर प्रभु के सम्मुख वर्णी जी की यह प्रार्थना पढ़कर प्रसन्नता की अनुभूति अवश्य करेंगे। आगे का अंश अगली प्रस्तुती में प्रस्तुत होगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३७*
          तीन दिन तक कुण्डलपुर क्षेत्र पर रहा और तीनों दिन श्री वीर प्रभु के दर्शन किए। मैंने वीर प्रभु से जो प्रार्थना की थी उसे आज के शब्दों में निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं-       हे प्रभो ! यद्यपि आप वीतराग सर्वज्ञ हैं, सब जानते हैं, परंतु वीतराग होने से चाहे आपका भक्त हो चाहे आपका भक्त न हो, उस पर आपको न राग होता है और न द्वेष।           जो जीव आपके गुणों में अनुरागी है उनमें स्वयमेव शुभ परिणामों का संचार हो जाता है और वे परिणाम ही पुण्यबंध में कारण हो जाते हैं।'      'इति स्तुति देव ! विधाय दैंयाद्
     वरं न याचे त्वमुपेक्षकोसि।
    छाया तरुं संश्रयतः स्वतः स्यात,
    कश्छायया याचितयात्मलाभः।'      यह श्लोक धनंजय सेठ ने श्री आदिनाथ प्रभु के स्तवन के अंत में कहा है। इस प्रकार आपका स्तवन कर हे देव ! मैं दीनता से कुछ वरकी याचना नहीं करता; क्योंकि आप उपेक्षक हैं।         'रागद्वेषयोरप्रणिधानमुपेक्षा' यह उपेक्षा जिसके हो उसको उपेक्षक कहते हैं। श्री भगवान उपेक्षक हैं, क्योंकि उनके राग द्वेष नहीं है।        जब यह बात है तब विचारो, जिनके राग द्वेष नहीं उनकी अपने भक्त में भलाई करने की बुद्धि ही नहीं हो सकती। वह देखेंगे ही क्या?      फिर यह प्रश्न हो सकता है उनकी भक्ति करने से क्या लाभ? उनका उत्तर यह है कि जो मनुष्य छायादार वृक्ष के नीचे बैठ गया, उसको इसकी आवश्यकता नहीं कि वृक्ष से याचना करे-हमें छाया दीजिए। वह तो स्वयं ही वृक्ष के नीचे बैठकर छाया का लाभ ले रहा है।       एवं श्री भगवान के गुणों का रुचिपूर्वक स्मरण करता है उनके मंद कषाय होने से स्वयं शुभोपयोग होता है और उसके प्रभाव से स्वयं शांति का लाभ होने लगता है। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल१०?

Abhishek Jain

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३६


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        रुचिवान पाठक यह विचार कर रहे होंगे कि गणेश प्रसाद ने नैनागिरि से श्री कुण्डलपुर जाते समय रास्ते में जहाँ रात्रि विश्राम किया था वहाँ लोगों के भोजन के आग्रह के निवेदन में क्या किया। आज आप वह जानेगें।        श्री कुण्डलपुर जी की वंदना तो अधिकांश पाठकों ने की होगी। लेकिन वर्णी जी का वंदना संबंधी अनुभूति परक वर्णन का यह उल्लेख आपकी वंदना की स्मृति को ताजा करेगा ही साथ ही उस समय वर्णीजी द्वारा की गई आनन्दनुभीति का भी अनुभव करायेगा।           कभी कभी प्रस्तुती में कुछ अंशों की पुनरावृत्ति रहती है। पुनरावृत्ति का उद्देश्य मात्र कथन का योग्य स्पष्टीकरण रहता है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३६*             
      सायंकाल होते-होते एक गाँव में पहुँच गया। थकावट के कारण एक अहीर के घर ठहर गया। उसने रात्रि में आग जलाई और कहा 'भोजन बना लो। मेरे यहाँ भूखे पड़े रहना अच्छा नहीं। आप तो भूखे रहो और हम लोग भोजन कर लें, यह अच्छा नहीं लगता।'        मैंने कहा- 'भैया ! मैं रात्रि को भोजन नहीं करता।' उसने कहा- 'अच्छा, भैस का दूध ही पी लो, जिससे मुझे तसल्ली हो जाय।'       मैंने कहा- 'मैं पानी के सिवा और कुछ नहीं लेता।' वह बहुत दुखी हुआ। स्त्री ने यहाँ तक कहा- 'भला, जिसके दरवाजे पर मेहमान भूखा पड़ा रहे उसको कहाँ तक संतोष होगा।'        मैंने कहा- 'माँ जी ! लाचार हूँ।' तब उस गृहणी ने कहा- 'प्रातःकाल भोजन करके जाना, अन्यथा आप दूसरे स्थान पर जाकर सोवें।'
           मैंने कहा- 'अब आपका सुंदर घर पाकर कहाँ जाऊँ? प्रातः काल होने पर आपकी आज्ञा का पालन होगा।'         किसी प्रकार उन्हें संतोष कराके सो गया। बाहर दालान में सोया था, अतः प्रातःकाल मालिक के बिना पूछे ही ५ बजे चल दिया और १० मील चलकर एक ग्राम में ठहर गया।        वहीं पर श्री जिनालय के दर्शन कर पश्चात भोजन किया और सायंकाल फिर १० मील चलकर एक ग्राम में रात्रि को सो गया, पश्चात प्रातःकाल वहाँ से चल दिया। इसी प्रकार मार्ग को तय करता हुआ कुण्डलपुर पहुँच गया।         अवर्णनीय क्षेत्र है। यहाँ पर कई सरोवर तथा आम के बगीचे हैं। एक सरोवर अत्यंत सुंदर है। उसके तट पर अनेक जैनमंदिर गगनचुम्बी शिखरों से सुशोभित एवं चारों तरफ आम वृक्षों से वेष्टित भव्य पुरुषों के मन को विशुद्ध परिणाम के कारण बन रहे हैं।         उनके दर्शन कर चित्त अत्यंत प्रसन्न हुआ। प्रतिमाओं के दर्शन कर जो आनंद होता है उसे प्रायः सब ही आस्तिक जन लोग जानते हैं और नित्य प्रति उसका अनुभव भी करते हैं।         अनंतर पर्वत के ऊपर श्री महावीर स्वामी के पद्मासन प्रतिबिम्ब को देखकर तो साक्षात श्रीवीरदर्शन का ही आनंद आ गया। ऐसी सुभग पद्मासन प्रतिमा मैंने तो आज तक नहीं देखी!           तीन दिन तक इस क्षेत्र पर रहा और तीनों दिन श्री वीर प्रभु के दर्शन किए। मैंने वीर प्रभु से जो प्रार्थना की थी उसे आज के शब्दों में निम्न प्रकार व्यक्त कर सकते हैं- ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ५ ?

Abhishek Jain

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३५


जय जिनेन्द्र बंधुओं,        मैं जब पूज्य वर्णीजी की आत्मकथा को पढ़ता हूँ। ह्रदय भीग जाता है उनके जीवन को जानकर।         यदि आप भी पूज्य वर्णीजी के जीवन चरित्र को रुचि पढ़ रहे हैं तो आपका अंतःकरण भी एक महापुरुष के जीवन को नजदीक से स्पर्श करके अद्भुत आनंद के अनुभव से अछूता नहीं रहेगे।         आत्मकथा में आज के अंश से ज्ञात होता है कि भले ही उनके पास साधन नहीं थे लेकिन गणेश प्रसाद आत्मसाधना के लिए कितने व्याकुल थे।        रेशन्दीगिरि अर्थात सिद्ध क्षेत्र नैनागिरि वंदना के साथ उसके प्रति आकर्षण उनकी आत्मा का धर्म के प्रति असामान्य लगाव का परिचय देती है।       श्री कुण्डलपुर की वंदना हेतु पैदल यात्रा में रास्ते में किसी के घर ठहरना, घर वालों का रात्रि में भोजन हेतु विशेष आग्रह आदि बहुत रोचक है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३५*       
                 रेशन्दीगिरि मैं तीन दिन रहा। चित्त जाने को नहीं चाहता था। चित्त में यही आता कि 'सर्व विकल्पों को त्यागो और धर्म-साधन करो। परंतु साधनों के अभाव में दरिद्रों के मनोरथों के समान कुछ न कर सका।'         चार दिन के बाद श्री अतिशय क्षेत्र कुण्डलपुर के लिए प्रस्थान किया। प्रस्थान के समय आँखों में अश्रुधारा आ गई। चलने में गति का वेग न था, पीछे-पीछे देखता जाता था और आगे-आगे चलता जाता था। बलात्कार जाना ही पड़ा।       सायंकाल होते-होते एक गाँव में पहुँच गया। थकावट के कारण एक अहीर के घर ठहर गया। उसने रात्रि में आग जलाई और कहा 'भोजन बना लो। मेरे यहाँ भूखे पड़े रहना अच्छा नहीं। आप तो भूखे रहो और हम लोग भोजन कर लें, यह अच्छा नहीं लगता।'        मैंने कहा- 'भैया ! मैं रात्रि को भोजन नहीं करता।' उसने कहा- 'अच्छा, भैस का दूध ही पी लो, जिससे मुझे तसल्ली हो जाय।'       मैंने कहा- 'मैं पानी के सिवा और कुछ नहीं लेता।' वह बहुत दुखी हुआ। स्त्री ने यहाँ तक कहा- 'भला, जिसके दरवाजे पर मेहमान भूखा पड़ा रहे उसको कहाँ तक संतोष होगा।'        मैंने कहा- 'माँ जी ! लाचार हूँ।' तब उस गृहणी ने कहा- 'प्रातःकाल भोजन करके जाना, अन्यथा आप दूसरे स्थान पर जाकर सोवें।'
           मैंने कहा- 'अब आपका सुंदर घर पाकर कहाँ जाऊँ? प्रातः काल होने पर आपकी आज्ञा का पालन होगा।' ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ४ ?

Abhishek Jain

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३४


जय जिनेन्द्र बंधुओं,         आत्मकथा की आज की प्रस्तुती में पूज्य वर्णीजी द्वारा रेशन्दीगिरी सिद्ध क्षेत्र की वंदना के समय अपनी अनुभूति का वर्णन है।         रुचिवान पाठक अवश्य ही वर्णीजी की अनुभूति के वर्णन को पढ़कर अपने अंदर भी आनंदानुभूति कर रहे होंगे। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३४*
           पूज्य वर्णी जी अपनी आत्मकथा में रेशन्दीगिरी तीर्थ की वंदना के समय अपने अनुभूति को व्यक्त करते हुए लिखते हैं।        रेशन्दीगिरी पर एक अत्यन्त मनोहर देवी का प्रतिबिम्ब देखा, जिसे देखकर प्राचीन सीलावटों की कर-कुशलता का अनुमान सहज में ही हो जाता था। ऐसी अनुपम मूर्ति इस समय के शिल्पकार निर्माण करने में समर्थ नहीं।          पश्चात मंदिरों के बिम्बों की भक्तिपूर्वक पूजा की। यह वही पर्वतराज है जहाँ श्री १००८ देवाधिदेव पार्श्वनाथ प्रभु का समवशरण आया था और वरदत्तादि पाँच ऋषिराजों ने निर्वाण प्राप्त किया था। रेशन्दीगिरि इसी का नाम है।         यहाँ पर चार या पाँच मंदिरों को छोड़ शेष सब मंदिर छोटे हैं। जिन्होंने निर्माण कराये वे अत्यंत रुचिमान थे, जो मंदिर तो मामूली बनवाये, पर प्रतिष्ठा कराने में पचासों हजार रुपये खर्च कर दिए।        यहाँ अगहन सुदी ग्यारस से पूर्णिमा तक मेला भरता है। जिसमें भारत भर के जैनियों का समारोह होता है। दस हजार तक जैनसमुदाय हो जाता है। यह साधारण मेला की बात है। रथ के समय तो पचास हजार तक की संख्या एकत्रित हो जाती है।         एक नाला भी है जिसमें सदा स्वच्छ जल बहता रहता है। चारों तरह सघन वन है। एक धर्मशाला है, जिसमें पाँचसौ आदमी ठहर सकते हैं। यह प्रान्त धर्मशाला बनाने में द्रव्य नहीं लगाता।           प्रतिष्ठा में लाखों रुपये रुपये व्यय हो जाते हैं। जो कराता है उसके पच्चीस हजार रुपये से कम खर्च नहीं होते। आगन्तुक महाशयों के आठ रुपया प्रति आदमीं के हिसाब से चार लाख हो जाते हैं। परंतु इन लोगों की दृष्टि धर्मशाला के निर्माण कराने की ओर नहीं जाती।          मेला या प्रतिष्ठा के समय यात्री अपने-अपने घर से डेरा या। झुंगी आदि लाते हैं और उन्ही में निवासकर पुण्य का संचय करते हैं। यहाँ पर अगहन मास मास में इतनी सरदी पड़ती है कि पानी जम जाता है। प्रातःकाल कँपकँपी लगने लगती है। ये कष्ट सहकर भी हजारों नर-नारी धर्मसाधन करने में कायरता नहीं करते। ऐसा निर्मल स्थान प्रायः भाग्य से ही मिलता है।
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
   ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ शुक्ल ३ ?

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रेशन्दीगिरी व कुण्डलपुर - ३३


जय जिनेन्द्र बंधुओं,           जिनधर्म में अनुरक्त अंतःकरण वाले गणेश प्रसाद अपनी माँ व पत्नी के पास वापिस तो आ गए लेकिन उनका मन धर्म-ध्यान की क्रियाओं की ओर ही आकर्षित था।         पिछले प्रसंग से स्पष्ट होता है कि पूज्य वर्णी जी की स्थिति बहुत दीनता पूर्ण थी।      उनकी आत्मा का धर्म-ध्यान के प्रति आकर्षण ही उनकी तीर्थवंदना आदि को प्रेरित कर रहा था जबकि गणेश प्रसाद को स्वयं ही मालूम नहीं था कि तीर्थवंदना आदि क्रियाओं का उनका उद्देश्य क्या है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?
          *"रेशन्दीगिरि व कुण्डलपुर"*
                     *क्रमांक - ३३*
               मैं दस रुपये लेकर बमराना से मड़ावरा आ गया। पाँच दिन रहकर माँ तथा स्त्री की अनुमती के बिना ही कुण्डलपुर की यात्रा के लिए प्रस्थान कर दिया। मेरी यात्रा निरुद्देश्य थी। क्या करना, कुछ भी नहीं समझता था।         'हे प्रभो ! आप ही संरक्षक हैं' ऐसा विचरता हुआ मड़ावरा से चौदह मील बरायठा नगर में आया। यहाँ जैनियों के साथ घर हैं। सुंदर उच्च स्थान पर जिनेन्द्र देव का मंदिर है। मंदिर के चारों ओर कोट है। कोट के बीच में ही छोटी सी धर्मशाला है। उसी में रात्रि में ठहर गया।           यहाँ सेठ कमलापति जी बहुत ही प्रखर बुद्धि के मनुष्य हैं। आपका शास्त्र ज्ञान बहुत अच्छा है। उन्होंने मुझे बहुत आश्वासन दिया और समझाया कि तुम यहाँ ही रहो। मैं सब तरह से सहायता करूँगा।         आजीविका की चिंता मत करो। अपनी माँ और पत्नी को बुला लो। साथ ही यह भी कहा कि मेरे सहवास से आपको शीघ्र ही जैनधर्म का बोध हो जाएगा।         मैंने कहा- 'अभी श्री कुण्डलपुर की यात्रा को जाता हूँ। यात्रा करके आ जाऊँगा।' सेठजी साहब ने कहा - 'आपकी इच्छा, परंतु निरूद्देश्य भ्रमण करना अच्छा नहीं है।'
? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?
  ?आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृ. १३/१४?

Abhishek Jain

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सेठ लक्ष्मीचंद जी - ३२

?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"सेठ लक्ष्मीचंद जी"*                     क्रमांक - ३२                उन्होंने मुझसे कहा- 'आपका शुभागमन कैसे हुआ?' मैंने कहा- 'क्या कहूँ? मेरी दशा अत्यंत करुणामयी है। उसका दिग्दर्शन कराने से आपके चित्त में खिन्नता ही बढ़ेगी।       प्राणियों ने जो अर्जन किया है उसका फल कौन भोगे? मेरी कथा सुनने की इच्छा छोड़ दीजिए। कुछ जैनधर्म का वर्णन कीजिए, जिससे शांति का लाभ हो।'         आपने एक घण्टा आत्मधर्म का समीचीन रीति से विवेचन कर मेरे खिन्न चित्त को संतोष लाभ कराया। अनन्तर पूंछा- अब तो अपनी आत्मकथा सुना दो।           मैं किंकर्तव्यविमूढ़ था, अतः सारी बातें न बता सका। केवल जाने की इच्छा जाहिर की। यह सुन श्री सेठ लक्ष्मीचंदजी ने बिना माँगे ही दस रुपया मुझे दिये और कहा आनंद से जाइये। साथ ही आश्वासन भी दिया कि कुछ व्यापार करने की इच्छा हो तो सौ या दो सौ की पूँजी लगा देंगे।          पाठकगण, इतनी छोटी सी रकम से क्या व्यापार होगा, ऐसी आशंका न करें, क्योंकि उन दिनों दो-सौ में बारह मन घी और पाँच मन कपढ़ा आता था। तथा एक रुपये का एक मन गेहूँ, सवा मन चना, ढ़ेड़ मन जुवारी और दो मन कोदों बिकते थे। उस समय अन्नादि की व्यग्रता किसी को न थी। घर-२ दूध और घी का भरपूर संग्रह रहता था। ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण १२ ?

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सेठ लक्ष्मीचंद जी - ३१

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           गणेश प्रसाद ने जिनधर्म पर आस्था के आधार पर अपनी माँ तथा पत्नी के साथ रहना तभी उचित समझा था जब वह लोग भी अपना आचरण जिनधर्म के अनुसार रखें। उन्होंने अपनी माँ को इस हेतु पत्र भी लिखा था।          आज के प्रस्तुती में उनका अपनी माँ के पास आने का उल्लेख है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"सेठ लक्ष्मीचंद जी"*                     क्रमांक - ३१              मुझे आया हुआ देख माँ बड़ी प्रसन्न हुई। बोली- 'बेटा ! आ गये?' मैंने कहा- 'हाँ माँ ! आ गया।'        माँ ने उपदेश दिया- 'बेटा ! आनंद से रहो, क्यों इधर उधर भटकते हो। अपना मौलिक धर्म पालन करो और कुछ व्यापार करो, तुम्हारे काका समर्थ हैं। वे तुम्हे व्यापार की पद्धति सिखा देंगे।'         मैं माँ की शिक्षा सुनता रहा, परंतु जैसे चिकने घड़े में पानी का प्रवेश नहीं होता वैसे ही मेरे ऊपर उस शिक्षा का कोई असर नहीं हुआ। मैं तीन दिन वहाँ रहा। पश्चात माँ की आज्ञा से बमराना चला गया।      यहाँ श्री सेठ व्रजलाल, चंद्रभान व श्री लक्ष्मीचंद जी साहब रहते थे। तीनों भाई धर्मात्मा थे। निरंतर पूजा करना, स्वाध्याय करना व आये हुए जैनी को सहभोजन कराना आपका प्रतिदिन का काम था। तब आपके यहाँ चौके में ५० से कम जैनी भोजन नहीं करते थे। कोई विद्वान व त्यागी आपके यहाँ सदा रहता ही था।        मंदिर इतना सुंदर था मानों स्वर्ग का चैत्यालय ही  हो। जिस समय तीनों भाई पूजा के लिए खड़े होते थे, उस समय ऐसा मालूम होता था मानों इंद्र ही स्वर्ग से आये हों।        तीनों भाईयों में परस्पर राम-लक्ष्मण की तरह प्रेम था। मंदिर मे पूजा आदि महोत्सव होते समय चतुर्थ काल का स्मरण हो आता था। स्वाध्याय में तीनों भाई बराबर तत्वचर्चा कर एक घंटा समय लगाते थे। साथ ही अन्य श्रोतागण उपस्थित रहते थे।          इन तीनों में लक्ष्मीचंद जी सेठ प्रखर बुद्धि थे। आपको शास्त्र प्रवचन का एक प्रकार से व्यसन ही था। आपकी चित्त व्यत्ति भी निरंतर परोपकार में रत रहती थी।             ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण ११ ?

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खुरई में तीन दिन - ३०

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           आत्मकथा की आज की प्रस्तुती से ज्ञात होगा कि वर्णी जी ने विद्धवान के अनुचित कथन के प्रतिउत्तर में ज्ञानार्जन की प्रतिज्ञा अवश्य की लेकिन उनके पास ज्ञानार्जन हेतु कोई साधन नहीं था।         पूज्य वर्णीजी की आत्मकथा को जैसे जैसे हम पढ़ते जाएँगे वैसे वैसे ज्ञात होता रहेगा कि कैसी कठिन परिस्थितयों में आगे बढ़ते हुए उन्होंने ज्ञानार्जन किया और अन्य लोगों को भी ज्ञानार्जन का मार्ग प्रशस्त किया। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - ३०              मैं इस तरह पण्डितजी के ऊपर बहुत ही खिन्न हुआ। साथ ही प्रतिज्ञा की कि किसी तरह ज्ञानार्जन करना आवश्यक है।         प्रतिज्ञा तो कर ली, परंतु ज्ञानार्जन करने का कोई भी साधन न था। पास में न तो द्रव्य ही था और न किसी विद्धवान का समागम ही था।           कुछ उपाय नहीं सूझता था, रेवा के तट पर स्थित मृग जैसी दशा थी। रेवा नदी के तट पर एक बड़ा भारी पर्वत है, वहाँ पर असहाय एक मृग का बच्चा खड़ा हुआ है, उसके सामने रेवा नदी है और पर्वत भी।        दाएँ-बाएँ दावानल की ज्वाला धधक रही है, पीछे शिकारी हाथ में धनुष वाण लिए मारने को दौड़ रहा है। ऐसी हालात में वह हरिण का शावक विचार करता है कि कहाँ जावें और क्या करें।         उसी समय हमारी भी ठीक यही अवस्था थी। क्या करें, कुछ भी निर्णय नहीं कर सके। दो या तीन दिन खुरई में रहकर बनपुरया और वैद्य नंदकिशोरजी की इच्छानुसार मैं मड़ावरा अपनी माँ के पास चला गया। रास्ते में तीन दिन लगे। लज्जावश रात्रि को घर पहुँचा।                   ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण १० ?

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खुरई में तीन दिन - २९

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,        आज की प्रस्तुती का यह प्रसंग वर्णी जी के जीवन का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग है। कल की प्रस्तुती में हमने देखा विद्धवान ने गणेश प्रसाद से कहा कि अच्छे खान पान के लोभ में लोग जैन धर्म को धारण करते हैं।       वर्णी जी ने उन विद्धवान की अनुचित बातों के उत्तर में जो कहा उससे उनके अंदर, विद्धवान के कथन के कारण उत्पन्न हुई अंतर्वेदना स्पष्ट होती है। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - २९              पण्डितजी की बात सुनकर मुझे बहुत खेद हुआ। मैंने कहा- 'महराज ! आपने मुझे सांत्वना के बदले वाकबाणों की वर्षा से आछन्न कर दिया। मेरी आत्मा में तो इतना खेद हुआ, जिसे मैं व्यक्त ही नहीं कर सकता।           आपने मेरे साथ जो इस तरह का व्यवहार किया, सो आप ही बतलाइये कि मैंने आपसे क्या चंदा माँगा था या कोई याचना की थी, या आजीविका का साधन पूंछा था? व्यर्थ ही आपने मेरे साथ अन्याय किया।          क्या यहाँ पर जितने श्रोता हैं वे सब आपकी तरह शास्त्र वाँचने में पटु हैं या सब ही जैनधर्म के मार्मिक पंडित हैं? नहीं, मैं तो एक भिन्न कुल का भिन्न धर्म का अनुयायी हूँ। और फिर आप जैसे विद्धवानों के सामने कहता ही क्या?       मैंने जो कुछ कहा, बहुत था, परंतु न जाने आपको मेरे ऊपर क्यों बेरहमी हो गई। मेरे दुर्दैव का ही प्रकोप है। अस्तु,        अब पण्डितजी ! आपसे शपथ पूर्वक कहता हूँ- उस दिन ही आपके दर्शन करूँगा, जिस दिन धर्म का मार्मिक स्वरूप आपके समक्ष रखकर आपको संतुष्ट कर सकूँगा। आज आप जो वाक्य मेरे प्रति व्यवहार में लाये है तब आपको वापिस लेने पड़ेंगे।'        ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण ९ ?

Abhishek Jain

Abhishek Jain

 

खुरई में तीन दिन - २८

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,        जैनधर्म की महान प्रभावना करने वाले पूज्य वर्णी जी से उनके प्रारंभिक समय में जब वह अपनी ज्ञान लिप्सा के आधार पर आत्मकल्याण हेतु जैनधर्म के मर्म को जानने हेतु पुरुषार्थ शील थे,       विद्धवान ने गणेश प्रसाद से कहा- *मनुष्य जैनधर्म को कुछ समझते तो है नहीं, केवल खानपान के लोभ में जैन बन जाते हैं।*      आत्मकथा का यह प्रसंग वर्णी को जिनागम के ज्ञान प्राप्ति हेतु उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण बिंदु था।     विद्धवान के इस तरह के व्यवहार से ही वर्णी जी संकल्पित हुए जिनधर्म के मर्म जानने को। उनकी प्रतिज्ञा का उल्लेख अगली प्रस्तुती में रहेगा। ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?              *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - २८              श्री प्रभु पार्श्वनाथ के दर्शन के अनन्तर श्रीमान पंडितजी का प्रवचन सुना। पंडितजी बहुत ही रोचक व मार्मिक विवेचन के साथ तत्व की व्याख्या करते थे। यद्यपि पण्डितजी का विवेचन सारगर्भित था, परंतु हम अज्ञानी लोग उसका विशेष लाभ नहीं ले सके।       फिर भी विशुद्ध भाव होने से पुण्य का संचय करने में समर्थ हुए। शास्त्र समाप्ति के अनन्तर डेरापर आकर सो गये। प्रातः काल शौचादि से निरवृत्त होकर श्री मंदिरजी में दर्शनार्थ करने के निमित्त चले गए। प्रातःकाल का समय था। लोग स्वर के साथ पूजन कर रहे थे। सुनकर मैं गदगद हो गया। देव-देवांगनाओं की तरह मंदिर में पुरुष और नारियों का समुदाय था। इन सबके स्तवनादि पाठ से मंदिर गूँज उठता था।             ऐसा प्रतीत होता था, मानो मेघध्वनि हो रही हो। पूजा समाप्त होने के अनन्तर श्रीमान पण्डितजी का प्रवचन हुआ। पण्डितजी समयसार और पद्मपुराण शास्त्रों का रहस्य इतनी स्वच्छ प्रणाली से कह रहे थे कि दो सौ स्त्री पुरुष चित्रलिखित मनुष्यों के समान स्थिर हो गये थे। मेरी आत्मा में विलक्षण स्फूर्ति हुई।         जब शास्त्र विराजमान हो गए, तब मैंने श्रीमान वक्ताजी से कहा- हे भगवन ! मैं अपनी मनोवृत्ति मे जो कुछ आया उसे आपको श्रवण कराना चाहता हूँ।' आज्ञा हुई- 'सुनाओ।'       मैंने कहा- 'ऐसा भी कोई उपाय है जिससे मैं जैनधर्म का रहस्य जान सकूँ?' आपने कहा- 'तुम कौन हो?'      मैंने कहा- 'भो भगवन ! मैं वैष्णव कुल के असाटी वंश में उत्पन्न हुआ हूँ। मेरे वंश के सभी लोग वैष्णव धर्म के उपासक हैं, किन्तु मेरी श्रद्धा भाग्योदय से इस जैनधर्म में दृढ़ हो गई है। निरंतर इसी चिंता में रहता हूँ कि जैनधर्म का कुछ ज्ञान हो जाए।'       पण्डितजी महोदय ने प्रश्न किया- कि 'तुमने जैनधर्म में कौन सी विलक्षणता देखी, जिससे कि तुम्हारी अभिरुचि जैनधर्म की ओर हो गई है? '      मैंने कहा- 'इस धर्म वाले दया का पालन करते हैं, छानकर पानी पीते हैं, रात्रि भोजन नहीं करते, स्वच्छता पूर्वक रहते हैं, स्त्री पुरुष प्रतिदिन मंदिर जाते हैं, मंदिर मे मूर्तियाँ बहुत सुंदर होती हैं, प्रतिदिन मंदिर में शास्त्र प्रवचन होता है, किसी दूसरी जाति का भोजन नहीं करते हैं और भोजन की सामग्री सम्यक प्रकार देखकर उपयोग में लाते हैं इत्यादि शुभाचरण की विशेषता देखकर मैं जैनधर्म मैं दृढ़ श्रद्धावान हो गया हूँ।'        पण्डितजी ने कहा- 'यह क्रिया तो हर धर्म वाले कर सकते हैं, हर कोई दया पालता है। तुमने धर्म का मर्म नहीं समझा। आजकल मनुष्य न तो कुछ समझें और न जानें, केवल खान-पान के लोभ से जैनी हो जाते हैं। तुमने बड़ी भूल की, जो जैनी हो गए, ऐसा होना सर्वथा अनुचित है। वंचना करना महापाप है।        जाओ, मैं क्या समझाऊँ। मुझे तो तुम्हारे ऊपर तरस आता है। न तो तुम वैष्णव ही रहे और न जैनी ही। व्यर्थ ही तुम्हारा जीवन जायेगा।'                  ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण ८ ?

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खुरई में तीन दिन - २७

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,           अजैन कुल में जन्म होने बाद भी जिनधर्म से ही अपना कल्याण हो सकता है यह भावना रखकर आगे बढ़ने वाले गणेश प्रसाद का वर्णन उनकी ही आत्मकथा के अनुसार चल रहा है।          आज की प्रस्तुती में उनका खुरई जाने तथा वहाँ के जिनालय में जिनबिम्बों  का वर्णीजी द्वारा किए गए गुणावाद का आनंदप्रद वर्णन है।        ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी?                *"खुरई में तीन दिन"*                     क्रमांक - २७              तीन या चार दिन में मैं खुरई पहुँच गया। वे सब श्रीमन्त के यहाँ ठहर गये। उनके साथ मैं भी ठहर गया। यहाँ श्रीमन्त से तात्पर्य श्रीमान श्रीमन्त सेठ मोहनलाल जी से है। आप करोड़पति थे।       करोड़पति तो बहुत होते हैं परंतु आपकी प्रतिभा वृहस्पति के सदृश थी। आप जैन शास्त्र के मर्मज्ञ विद्धवान थे। आप प्रतिदिन पूजा करते थे। आप जैन शास्त्र के ही मर्मज्ञ विद्धवान न थे किन्तु राजकीय कानून के भ प्रखर पंडित थे।         सरकार में आपकी प्रतिष्ठा अच्छे रईस के समान होती थी। खुरई के तो आप राजा कहलाते थे। आपके सब ठाट राजाओं के समान थे। जैन जाति के आप भूषण थे।       आपके यहाँ तीन माह बाद एक कमेटी होती थी, जिसमें खुरई सागर प्रान्त की जैन जनता सम्मलित होती थी। उसका कुल व्यय आप ही करते थे। आपके यहाँ पन्नालालजी न्यायदिवाकर व श्रीमान शांतिलालजी साहब आगरा वाले आते रहते थे। उनके आप अत्यंत भक्त थे। उस समय आप दिगम्बर जैन महासभा के मंत्री भी थे।         सायंकाल को सब लोग श्री जिनालय गए। श्री जिनालय की रचना देखकर चित्त प्रसन्न हुआ, किन्तु सबसे अधिक प्रसन्नता श्री १००८ देवादिदेव पार्श्वनाथ के प्रतिबिम्ब को देखकर हुई। यह सातिशय प्रतिमा है। देखकर ह्रदय में जो प्रमोद हुआ वह अवर्णनीय है।           नासादृष्टि देखकर यही प्रतीत होता था कि प्रभु की सौम्यता अतुल है। ऐसी मुद्रा वीतरागता की अनुमापक है। निरकुलता रूप वीतरागता ही अनंत सुख की जननी है।         मुझे जो आनंद आया वह किससे कहूँ? उसकी कुछ उपमा हो तब तो कहूँ। वह ज्ञान में तो आ गया, परंतु वर्णन करने को मेरे पास शब्द नहीं। इतना भर कह सकता हूँ कि वह आनंद पंचेन्द्रियों के विषय से भी आनंद आता है, परंतु उसमें तृष्णारोग रूप आकुलता बनी रहती है। मूर्ति के देखने से जो आनंद आया उसमें वह बात नहीं थी।           आप लोग मानें या न मानें, परंतु मुझे तो विलक्षणता का भान हुआ और आप मेरे द्वारा सुनना चाहें तो मेरी शक्ति से बाह्य है। मेरा तो यहाँ तक विश्वास है कि सामान्य घतपटादिक पदार्थों का जो ज्ञान है उसके व्यक्त करने की भी हममें सामर्थ्य नहीं है फिर इसका व्यक्त करना तो बहुत ही कठिन है।                                 ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण ३?

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सुरुपचन्द बनपुरिया और खुरई यात्रा - २६

☀जय जिनेन्द्र बंधुओं,            अपना कल्याण जिनधर्म से ही संभव है ऐसा अंतरंग श्रद्धान रखने वाले श्री गणेश प्रसाद,  जिनधर्म के मर्म को जानने की प्रवल इच्छा अपने अंदर रखकर, उसे पाने के लिए उनके सतत प्रयत्न का अवलोकन आत्मकथा के इन अंशो से होता है।        यहाँ जैनधर्म के अच्छे विद्धवान श्री निशोर वैद्य के  गणेश प्रसाद को महत्वपूर्ण उदभोदन का भी उल्लेख है।  ?संस्कृति संवर्धक गणेशप्रसाद वर्णी? *"सुरुपचंद्रजी बनपुरिया और खुरई यात्रा"*                     क्रमांक - २६              दूसरे पण्डित जवाहरलाल दरगैयां थे। इनके शास्त्र प्रवचन में भी मैं गया। आप भाषा के प्रखर पंडित थे। गला इतना सुरीला था कि अच्छे-२ गान विद्या वाले मोहित हो जाते थे।          जब वे उच्च स्वर से किसी चौपाय या दोहे का उच्चारण करते थे, तब दो फर्लांग तक इनका शब्द सुनाई पड़ता था। पाँच हजार जनता भी इनका प्रवचन सुन सकती थी। कहाँ तक लिखूँ?       इनके प्रवचन में आपसे आप सभा शांत भाव का आश्रय ले धर्म भाव करती हुई अपने कृत्य कृत्य समझती थी। जो एक बार आपका प्रवचन के लिए लोग पहले से ही उपस्थित हो जाते थे।         मैंने दो दिन इनके श्री मुख से प्रवचन सुना था, और फिर भी सुनने की इच्छा बनी रही। किन्तु खुरई जाना था इसलिए तीसरे दिन यहाँ से प्रस्थान कर दिया।        यहाँ से श्रीनंद किशोर वैद्य भी खुरई के लिए बनपुरया के साथ हो गए। आप वैद्य ही ना थे जैन धर्म के भी विद्धवान थे। इनका साथ हो जाने से मार्ग में किसी प्रकार की थकान नहीं हुई।       आपने मुझे बहुत समझाया और यह आदेश दिया कि तुम इस तरह भ्रमण मत करो, इससे कोई लाभ नहीं। यदि वास्तव में जैनधर्म का रहस्य जानने की अभिलाषा है तो मडावरा रहो और अपनी माँ तथा धर्मपत्नी को साथ रखो। वहाँ भी जैनी हैं। उनके संबंध से तुम्हारी समझ में जैनधर्म का रहस्य आ जाएगा। इसी में तुम्हारी प्रतिष्ठा है।        घर-२ फिरने से अनादर होने लगता है। मैं उनकी बात मान गया और खुरई यात्रा के बाद घर चले जाने की इच्छा जाहिर की। खुरई चलने का प्रयोजन बतलाते हुए मैंने कहा- 'सुनते हैं कि वहाँ पर श्री पन्नालालजी जैनधर्म के प्रखर विद्धवान हैं। उनके दर्शन कर मड़ावरा चला जाऊँगा।'                           ? *मेरी जीवन गाथा - आत्मकथा*?  ? आजकी तिथी- ज्येष्ठ कृष्ण४?

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